कैसे आर्थिक संकट से घिर गया था भारत
रातों-रात भारत का खजाना खाली नहीं हुआ था। 1980 के दौर में भारत विदेशों से अधिक कर्ज लेना शुरू करता है। जिसकी वजह से राजकोषीय घाटा देश का बढ़ता जाता है। 1990 में ईरान और कुवैत में युद्ध छिड़ जाता है। अचानक दुनिया भर में कच्चे तेल का दाम आसमान पर पहुंचने लगता है। 1989 से 1991 के दौर में भारत के अंदर भी अस्थिरता का माहौल था। इस काल खंड को भारत की राजनीति में अस्थिर सरकारों के लिए जाना जाता है।
इस मुश्किल दौर में एनआरआई अपना पैसा निकाल रहे थे। जबकि विदेशी कर्ज देने वाले लोग शॉर्ट टर्म क्रेडिट लाइन को आगे बढ़ाने से हिचकिचाने लगे। जून 1991 में विदेशी मुद्रा भंडार महज कुछ ही हफ्तों के इंपोर्ट के लिए बचा हुआ था। भारत को उस समय डॉलर की अधिक जरूरत थी। ऐसे में देश का सोना काम आया।
सोने ने बचाई लाज
मई 1991 में चंद्रशेखर की सरकार के वक्त 20 टन सोना विदेश भेजा गया। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के जरिए यह सोना यूनियन बैंक ऑफ़ स्विट्ज़रलैंड को ट्रांसफर किया गया। इस डील में सोना को फिर से खरीदने की बात शामिल थी। इस डील के पूरा होने के बाद भारत के खचाने में 200-215 मिलियन डॉलर विदेशी फंड आया। लेकिन उस वक्त के हालात के हिसाब से यह पैसा नाकाफी था।
जापान और इंग्लैंड के पास गिरवी रखा गया सोना
उस वक्त रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पास बहुत सोना रखा हुआ था। पॉलिसी मेकर्स को लगा कि इसका उपयोग करके भारत को आर्थिक दिवालिया होने से बचाया जा सकता है। जिसके बाद केंद्रीय बैंक का 46.91 टन सोना बैंक ऑफ जापान और बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास गिरवी रखा गया। इस डील के पूरा होने के बाद भारत के खाते में 405 मिलियन डॉलर विदेशी मुद्रा आई। बता दें, यह प्रक्रिया जितनी आसान दिख रही है। उतनी थी नहीं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने इस पूरे ऑपरेशन को बहुत ही गुप्त रखा था।
इन पैसों ने भारत के लिए कुछ समय की व्यवस्था कर दी थी। जिसके बाद हुए मनमोहन सिंह की अगुवाई में हुए रिफॉर्म की वजह से धीरे-धीरे अर्थव्यवस्था में सुधार होने लगा। अंततः भारत उस मुश्किल दौर से निकलने में कामयाब हो गया।
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