फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का 27 जून को निधन हो गया था। वह गोरखा रेजीमेंट के अफसर थे। मानेकशॉ आजादी से पहले सेना में शामिल हुए थे। वह ब्रिटिश रॉयस इंडियन आर्मी में फ्रंटियर रेजीमेंट में शामिल हुए थे। लेकिन देश के बंटवारे के बाद यह रेजीमेंट पाकिस्तान चला गया था और मानेकशॉ गोरखा रेजीमेंट में आ गए। यहीं पर गोरखा सैनिक उनको सैम बहादुर के नाम से पुकारने लगे थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर सैम मानेकशॉ के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में…
जन्म और परिवार
ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत के अमृतसर में 03 अप्रैल 1914 को सैम मानेकशॉ का जन्म हुआ था। उनका पूरा नाम सैम होरमूजजी फ्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ था। उनके पिता डॉ होर्मसजी मानेकशॉ था। शुरूआती पढ़ाई करने के लिए बाद उन्होंने हिंदू सभा कॉलेज से मेडिकल की पढ़ाई की। मानेकशॉ ने अपने पिता के खिलाफ जाकर जुलाई 1932 में भारतीय सैन्य अकादमी में दाखिला लिया। फिर दो साल बाद 4/12 फ्रंटियर फोर्स रेजीमेंट में भर्ती हुए।
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साल 1971 की जीत
जब भारत ने साल 1971 के युद्ध में सैन्य ताकत के बल पर पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। तो आर्मी चीफ सैम मानेकशॉ इसके हीरो के रूप में उभरे थे। उन्होंने रणनीति बनाने के साथ सेना की अगुवाई की थी। सिर्फ 14 दिनों में पाकिस्तान की हार तय कर दी थी। साल 1973 में रिटायर होने के एक दिन पहले सैम मानेकशॉ को फील्ड मार्शल की उपाधि दी गई थी।
बेबाक थे मानेकशॉ
सैम मानेकशॉ ने साल 1971 में देश की तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी से कहा था कि अभी सेना युद्ध के लिए तैयार नहीं है। उन्होंने इंदिरा गांधी से आग्रह किया कि उनको कुछ महीनों का समय दिया जाए। जिसके बाद इंदिरा गांधी ने उनकी बात मान ली और दिसंबर 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध शुरू हुआ और भारत को जीत मिली।
लगी थीं 7 गोलियां
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बर्मा मौर्चे पर मानेकशॉ को जापानी सैनिकों के खिलाफ मशीन गन की 7 गोलियां लगी थी। यह गोलियां मानेकशॉ के जिगर, आंतों और गुर्दे पर लगी थी। लेकिन इसके बाद भी मौत उनको छू भी नहीं सकी और खुद डॉक्टर भी उनकी हालत देखकर उनके बचने की उम्मीद छोड़ चुके थे। लेकिन सैम मानेकशॉ ने मौत को भी हरा दिया था।
मृत्यु
शानदार मिलिट्री करियर के बाद 27 जून 2008 को सैम मानेकशॉ का निधन हो गया था।
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