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आज (2 मार्च) रात होलिका दहन होगा, इस साल फाल्गुन पूर्णिमा तिथि दो दिन 2 और 3 मार्च को है। कल यानी 3 तारीख को चंद्रग्रहण भी है। इस वजह से होली खेलने की तारीख को लेकर पंचांग भेद हैं। कुछ पंचांग में 3 और कुछ में 4 मार्च को धुलंडी बताई गई है। होलिका दहन धर्म के साथ ही अच्छी सेहत का पर्व भी है।
अभी मौसम परिवर्तन हो रहा है। ठंड जा रही है और गर्मी बढ़ने लगी है। इस समय को ऋतुओं का संधिकाल कहते हैं यानी दो ऋतुओं के बीच का समय। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, होली से जुड़ी परपंराओं का पालन करने से धर्म के साथ ही स्वास्थ्य लाभ भी मिल सकते हैं। जानिए होलिका दहन से जुड़ी कुछ खास परंपराएं…
होलिका में कौन-कौन सी चीजें डाली जाती हैं?
होलिका दहन को यज्ञ का महत्व यज्ञ की तरह है। जिस तरह यज्ञ में अलग-अलग लकड़ियां और औषधियां डाली जाती हैं, ठीक इसी तरह होलिका में भी फल, शहद, गाय के गोबर से बने कंडे, काली मिर्च, हल्दी, घी, कमल गट्टा, काले तिल, चंदन, नीम की लकड़ी जैसी लकड़ियां और औषधियां डाली जाती हैं। जिस तरह यज्ञ का धुआं वातावरण को शुद्ध करता है, ठीक उसी तरह होलिका में डाली गई इन औषधियों का धुआं भी वातावरण के लिए लाभदायक रहता है।
होलिका की परिक्रमा क्यों करते हैं?
असुरराज हिरण्यकश्यपु की बहन होलिका भक्त प्रहलाद को लेकर आग में बैठ गई थी, उस समय भगवान विष्णु ने प्रह्लाद की रक्षा की थी और होलिका जल गई थी। जो होलिका सजाई जाती है, उसके लिए मान्यता है कि उसमें भक्त प्रह्लाद भी होते हैं। होलिका की पूजा के साथ ही भक्त प्रह्लाद और भगवान विष्णु की भी पूजा की जाती है। मान्यता है कि प्रह्लाद की पूजा और परिक्रमा करने से भगवान विष्णु की कृपा मिलती है। जलती होली यानी अग्नि को पवित्र माना जाता है, इसलिए उसकी परिक्रमा कर आशीर्वाद लिया जाता है। ध्यान रखें परिक्रमा करते समय जलती होलिका के करीब नहीं जाना चाहिए। परिक्रमा सावधानी से करनी चाहिए।
होलिका में अन्न क्यों डाल जाते हैं?
नई फसल पकने पर उत्सव मनाने की परंपरा है। इस समय गेहूं-चने की फसल आती है। फसल का पकना किसानों के लिए उत्सव मनाने की बात है। फसल पकने की खुशी में उत्सव मनाने की पुराने समय से चली आ रही है। जलती हुई होली के आसपास खुशियां मनाते हैं। जिस तरह जब हम घर पर खास खाना बनाते हैं, तो सबसे पहले भगवान को भोग लगाते हैं। ठीक इसी भाव से किसान जलती हुई होली में नई फसल का कुछ भाग भगवान को भोग के रूप चढ़ाते हैं।
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