सदियों से चली आ रही यह बीमारी आंखों को अंधा तो बना ही रही है लोगों को लाचार भी बना रही है लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज मेडिकल साइंस के सामने है कि काला मोतिया या ग्लूकोमा का इलाज क्या है और क्या इस बीमारी से निजात पाई जा सकती है, या इससे आंख की ऑप्टिक नर्व को हो चुके नुकसान को फिर से ठीक किया जा सकता है? आइए एक्सपर्ट से जानते हैं..
एम्स नई दिल्ली की पूर्व ग्लूकोमा चीफ और श्रॉफ आई सेंटर की हेड ग्लूकोमा डॉ. रमनजीत सिहोता कहती हैं कि ग्लूकोमा को आंखों की रोशनी का चोर कहते हैं क्योंकि यह बीमारी चुपचाप आंख में बढ़ती रहती है. आंखों के फ्लूड के भारी दवाब के चलते जब ऑप्टिक नर्व क्षतिग्रस्त होने लगती है तो ग्लूकोमा पैदा होता है और इस नर्व को होने वाले नुकसान के साथ बढ़ता जाता है. इससे नजर संकीर्ण यानि छोटी होती चली जाती है. जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, देखने की क्षमता ऐसी होती जाती है जैसे कोई हम किसी सुरंग के एक छोर से दूसरे छोर के बाहर के द्रश्यों को देख रहे हैं.
वे कहती हैं कि आमतौर पर ग्लूकोमा उम्र के हिसाब से बढ़ता है, 40 की उम्र के बाद ज्यादा मामले इस बीमारी के आते हैं, हालांकि ऐसा नहीं है कि यह बचपन में नहीं हो सकता. जेनेटिकली यह बढ़ता है, जैसे अगर किसी को परिवार में यह बीमारी है तो कई पीढ़ियों तक यह बीमारी किसी न किसी में आ जाती है. इसीलिए कहा जाता है कि आंखों के विजन की जांच कराना बेहद जरूरी है और आंखों के प्रेशर (IOP) की जांच कराना भी जरूरी है, ताकि इस बीमारी के बारे में पता लगाया जा सके.
जहां तक इस बीमारी के इलाज की बात है तो इस बीमारी के होने के बाद इसकी रोकथाम के इलाज मौजूद हैं. यानि इस बीमारी को उस स्टेज में आगे बढ़ने से रोका तो जा सकता है लेकिन इसको पूरी तरह न तो ठीक किया जा सकता है और न ही इससे आंख की रोशनी को हो चुके नुकसान की भरपाई की जा सकती है. एक बार इसने ऑप्टिक नर्व को जो नुकसान पहुंचा दिया है, उससे आगे होने वाले नुकसान को रोकने के लिए दवाइयां दी जाती हैं, लेजर किया जाता है और अगर जरूरत पड़ती है तो सर्जरी की जा सकती है.
ग्लूकोमा के नहीं दिखाई देते लक्षण
डॉ. सुनीता दुबे, एसोसिएट मेडिकल डायरेक्टर, ग्लूकोमा सेवाओं की प्रमुख और क्वालिटी एश्योरेंस की चेयरपर्सन, डॉ. श्रॉफ चैरिटी आई हॉस्पिटल, कहती हैं कि ग्लूकोमा की सबसे खास बाता है कि यह अक्सर धीरे-धीरे विकसित होता है और कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाता, यही कारण है कि कई मरीजों के रोग का तब तक पता नहीं चल पता जब तक बहुत ज्यादा नुकसान न हो जाए. विशेष रूप से 40 वर्ष की उम्र के बाद नियमित आंख की जांच और आईओपी की जांच बीमारी की जल्दी पहचान और नजर को बचाए रखने के लिए बेहद जरूरी है.
मरीज को भी देना होता है ध्यान
डॉ. सिहोता कहती हैं कि इसमें सबसे खास बात है कि मरीज को अपनी दवाएं टाइम से डालनी होती हैं. अगर फॉलोअप के लिए बुलाया जाता है तो मरीज को तय समय पर आना चाहिए.
इस बारे में बायोफार्मास्यूटिकल कंपनी एबवी के प्रबंध निदेशक सुरेश पट्टाथिल का कहना है कि इस बीमारी से बचाव का एक ही रास्ता है कि बीमारी की जल्दी पहचान हो. क्योंकि ऐसा होने से बीमारी का पता तो चल ही जाता है, नजर को और नुकसान से बचाने के लिए इलाज भी शुरू हो सकता है. ऐसे में जरूरी है कि आंखों की स्क्रीनिंग और उपचार सेवाओं की पहुंच हर गली और गांव तक होनी चाहिए, ताकि भारत में बढ़ते अंधेपन को रोका जा सके.
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