भारत सरकार 62,500 करोड़ रुपये की नई मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (MPMS) लेकर आई है। स्कीम के तहत, भारतीय हैंडसेट ब्रांड 5 प्रतिशत के ज्यादा इंसेंटिव के लिए एलिजिबल होंगे, क्योंकि सरकार उन घरेलू कंपनियों को सपोर्ट करना चाहती है जो विदेशी बाजारों में अपना विस्तार करना चाहती हैं।
मैन्युफैक्चरर्स को मिलेगा 5% तक इंसेंटिव
इस स्कीम के तहत, भारत में बने मोबाइल फोन की योग्य बिक्री पर मैन्युफैक्चरर्स को 2.25% से 5% तक का इंसेंटिव मिलेगा। कंपनियां खास कंपोनेंट्स और सब-असेंबली को घरेलू स्तर पर सोर्स करके 1.5% तक का अतिरिक्त इंसेंटिव भी पा सकती हैं। कैबिनेट से मंजूर इस फ्रेमवर्क में भारतीय ब्रांड बनाने के मकसद से प्रोडक्ट डिजाइन और रिसर्च एंड डेवलपमेंट के लिए योग्य बिक्री पर 3% का अतिरिक्त इंसेंटिव भी दिया जाएगा।
कृष्णन ने कहा कि भारतीय हैंडसेट ब्रांड 5 प्रतिशत के ज्यादा इंसेंटिव के लिए एलिजिबल होंगे, क्योंकि सरकार उन घरेलू कंपनियों को सपोर्ट करना चाहती है जो विदेशी बाजारों में अपना विस्तार करना चाहती हैं।
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 15 जुलाई को 62,500 करोड़ रुपये के बजट वाली नई स्कीम को मंजूरी दी। सरकार ने अपने पांच साल के कार्यकाल में कुल मिलाकर लगभग 39 लाख करोड़ रुपये के मोबाइल फोन प्रोडक्शन और करीब 60,000 डायरेक्ट नौकरियों का अनुमान लगाया है।
PLI 1.0 ने प्रोडक्शन और इन्वेस्टमेंट के लक्ष्यों को पार किया
यह स्कीम ‘बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम’ (PLI-LSEM) की तर्ज पर है, जिसकी अवधि 31 मार्च, 2026 को खत्म हो गई थी। पहले वाले प्रोग्राम का मुख्य मकसद बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग और मोबाइल फोन प्रोडक्शन को बढ़ाना था।
कृष्णन द्वारा शेयर किए गए आंकड़ों के अनुसार, PLI 1.0 के तहत मोबाइल फोन का प्रोडक्शन 8.12 लाख करोड़ रुपये के लक्ष्य के मुकाबले 11.61 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
उन्होंने कहा कि इस प्रोग्राम के तहत निवेश 20,500 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया, जबकि इसका लक्ष्य 7,000 करोड़ रुपये था। पहले वाली PLI स्कीम ने सैमसंग और भारत में ऐप्पल डिवाइस बनाने वाली कंपनियों समेत दुनिया भर की हैंडसेट बनाने वाली और कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को आकर्षित किया था। कृष्णन ने बताया कि PLI 1.0 के लॉन्च होने के बाद से भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स इकोसिस्टम में लगभग 14 अरब डॉलर का निवेश हुआ है, और मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग से अब लगभग 12 लाख लोगों को रोजगार मिल रहा है।
सरकार का ध्यान अब लोकलाइजेशन पर है
अगले चरण में देश में बनने वाले कंपोनेंट्स और सब-असेंबली की हिस्सेदारी बढ़ाने पर ज्यादा जोर दिया जाएगा। कृष्णन ने बताया कि मोबाइल फोन बनाने में घरेलू स्तर पर वैल्यू एडिशन लगभग 15 प्रतिशत से बढ़कर 23 प्रतिशत हो गया है। MPMS के तहत अतिरिक्त सोर्सिंग इंसेंटिव का मकसद मैन्युफैक्चरर्स को अपनी घरेलू सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए प्रोत्साहित करना है।
सरकार का कहना है कि भारत अब मोबाइल फोन बनाने के मामले में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है और देश में इस्तेमाल होने वाले 99.2 प्रतिशत मोबाइल फोन यहीं बनाए जाते हैं।
कृष्णन ने कहा कि 2014 और 2025 के बीच मोबाइल फोन के एक्सपोर्ट में 166 गुना बढ़ोतरी हुई, और इसकी सालाना कंपाउंड ग्रोथ रेट 59 प्रतिशत रही। उन्होंने आगे कहा कि FY26 में भारत के कुल इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट में मोबाइल फोन की हिस्सेदारी लगभग 61 प्रतिशत थी।
MeitY के अनुसार, 2025 में भारत से सबसे ज्यादा एक्सपोर्ट किए जाने वाले प्रोडक्ट कैटेगरी के तौर पर स्मार्टफोन के उभरने के बाद MPMS में बदलाव किया गया है।
कृष्णन ने कहा कि इस नई योजना का मकसद भारत के मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग उद्योग के दायरे और ग्लोबल कॉम्पिटिटिवनेस को बढ़ाना है, साथ ही घरेलू सप्लाई चेन को भी मजबूत करना है।
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