FPO Model Success Tips: बिहार के समस्तीपुर जिले के उजियारपुर प्रखंड में एक किसान ने पारंपरिक खेती की परिभाषा बदल दी है. देशुआ गांव के किसान मुकेश कुमार ने फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन के साथ अनुबंध कर बीज उत्पादन शुरू किया है, जिससे उन्हें बाजार भाव से ₹20 प्रति किलो अधिक की कीमत मिल रही है. अनुबंध आधारित यह खेती अब जिले के अन्य किसानों के लिए आत्मनिर्भरता का एक सफल मॉडल बनकर उभरी है.
एफपीओ मॉडल से बिचौलियों का अंत और सीधा लाभ
मुकेश कुमार ने इस बार अपनी दो एकड़ जमीन पर तोरी की खेती के लिए एक अलग रास्ता चुना. वे फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन से जुड़कर बीज उत्पादन के उद्देश्य से फसल तैयार कर रहे हैं. सामान्य तौर पर किसान अपनी उपज को स्थानीय मंडियों में मौजूदा बाजार भाव पर बेचने को मजबूर होते हैं. जहां वर्तमान में तोरी की कीमत 50 से 55 रुपये प्रति किलो के आसपास चल रही है. हालांकि, एफपीओ मॉडल के तहत मुकेश कुमार के लिए 75 रुपये प्रति किलो की दर से उपज की खरीद पहले ही सुनिश्चित कर ली गई है. इस अनुबंध के कारण उन्हें बाजार भाव से प्रति किलो 15 से 25 रुपये तक का अतिरिक्त लाभ मिल रहा है. यह मॉडल खेती को बाजार की अनिश्चितता से निकालकर एक सुरक्षित आय की गारंटी देता है.
मुफ्त इनपुट और वैज्ञानिक निगरानी ने बदली तस्वीर
अपनी सफलता साझा करते हुए मुकेश कुमार बताते हैं कि इस वर्ष उन्हें खेती के लिए बीज और खाद जैसी बुनियादी जरूरतें मुफ्त में उपलब्ध कराई गईं. सबसे खास बात यह है कि पूरी खेती कृषि वैज्ञानिकों की प्रत्यक्ष देखरेख में की जा रही है. समय-समय पर विशेषज्ञ खेतों का निरीक्षण करते हैं. कीट प्रबंधन से लेकर फसल की गुणवत्ता तक पर सलाह देते हैं. मुकेश ने बताया कि बुवाई से पहले ही फसल की कीमत तय हो जाने से मन में बाजार के उतार-चढ़ाव का डर खत्म हो गया है. प्रति किलो उत्पादन पर लगभग 3 रुपये का खर्च आता है, जिसका अर्थ है कि 75 रुपये की तय कीमत में से करीब 72 रुपये प्रति किलो शुद्ध आमदनी के रूप में प्राप्त होंगे. पहले जहां 40-50 रुपये के भाव के लिए भटकना पड़ता था. वहीं अब घर बैठे सुरक्षित मुनाफा मिल रहा है.
अनुबंध आधारित खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नई दिशा
यह पहल केवल एक किसान की सफलता नहीं बल्कि समस्तीपुर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक मजबूत उदाहरण है. अनुबंध आधारित इस मॉडल में किसान को फसल तैयार होने से पहले ही बाजार, कीमत और खरीदार की जानकारी मिल जाती है. इससे न केवल जोखिम कम होता है, बल्कि बिचौलियों की भूमिका भी पूरी तरह समाप्त हो जाती है. वैज्ञानिक तरीके और सही मार्गदर्शन से की जा रही यह खेती किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है. मुकेश कुमार की यह कामयाबी अब जिले के अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रही है, जो अब पारंपरिक खेती के बजाय मांग-आधारित और बीज उत्पादन आधारित मॉडल की ओर रुख करने पर विचार कर रहे हैं.
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मैंने अपने 12 वर्षों के करियर में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम किया है। मेरा सफर स्टार न्यूज से शुरू हुआ और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर डिजिटल और लोकल 18 तक पहुंचा। रिपोर्टिंग से ले…और पढ़ें
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