दरअसल, जब कोई विदेशी कंपनी या व्यक्ति भारत में किसी कंपनी, फैक्ट्री, बिजनेस या प्रोजेक्ट में सीधे पैसा लगाती है, तो उसे FDI कहते हैं। इसके पुराने नियमों के अनुसार पड़ोसी देशों से हर निवेश के लिए सरकारी मंजूरी जरूरी थी। इसका अप्रूवल मिलने में महीनों का समय लगता था, कोई डेडलाइन नहीं थी। साथ ही ‘बेनिफिशियल ओनर’ की परिभाषा को लेकर अस्पष्टता थी।
लेकिन, अब नए नियमों के अनुसार, 10% से कम ‘बेनिफिशियल ओनरशिप’ पर निवेश को ऑटोमैटिक अनुमति मिल गई है। इसमें मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए 60 दिन की समय सीमा तय कर दी गई है।
बताया जा रहा है कि केंद्र सरकार के इस फैसले का असर भारतीय स्टार्टप्स और डीप टेक सेक्टर पर पड़ेगा। सरकार का कहना है, इन बदलावों का उद्देश्य ग्लोबल फंड्स से निवेश हासिल करना और ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को बढ़ावा देना है।
प्रेस नोट 3 की वजह से ग्लोबल PE और VC फंड्स को निवेश में परेशानी हो रही थी, क्योंकि उनमें पड़ोसी देशों के निवेशकों का छोटा हिस्सा भी शामिल होता था। सरकार ने निवेश नियमों में पारदर्शिता के लिए ‘बेनिफिशियल ओनर’ की परिभाषा PMLA रूल्स, 2005 के समान कर दी है। जिससे अब 10% की सीमा तय होने से फंड का फ्लो आसान हो जाएगा।
सरकार ने साफ किया है कि इन बदलावों से विशेष रूप से तीन सेक्टरों को सबसे ज्यादा फायदा होगा। जिसमें इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स बनाने वाली कंपनियों को विदेशी निवेश और तकनीक मिल सकेगी। भारी मशीनरी और इंडस्ट्रियल इक्विपमेंट के प्रोडक्शन में तेजी आएगी। साथ ही रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।
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