इसका व्यापक इस्तेमाल आसान नहीं
फ्लैश पॉइंट में भारी गिरावट
सरकारी तेल कंपनियों यानी OMCs (Oil Marketing Companies) ने अपने रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटरों के जरिए डीजल में एथेनॉल मिलाने का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया। इन परीक्षणों में मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं और वाहन निर्माताओं को भी शामिल किया गया था। परीक्षणों का उद्देश्य यह पता लगाना था कि डीजल में एथेनॉल मिलाने से फ्यूल के प्रदर्शन, सुरक्षा और तकनीकी गुणों पर क्या असर पड़ता है। जांच के दौरान सबसे अहम समस्या डीजल के फ्लैश पॉइंट में भारी गिरावट के रूप में सामने आई।
फ्लैश पॉइंट किसी फ्यूल की सेफ्टी से जुड़ी बेहद महत्वपूर्ण विशेषता है। आसान भाषा में समझें तो यह वह न्यूनतम तापमान होता है, जिस पर किसी तरल फ्यूल से निकलने वाली वाष्प हवा के साथ मिलकर आग पकड़ने योग्य मिक्स्ड बना सकती है। अगर किसी फ्यूल का फ्लैश पॉइंट काफी कम हो जाता है, तो उसके भंडारण, परिवहन और इस्तेमाल के दौरान सुरक्षा संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं। यही कारण है कि डीजल के लिए निर्धारित फ्लैश पॉइंट मानक बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। एथेनॉल मिलाने के बाद डीजल का फ्लैश पॉइंट इतना गिर गया कि तैयार फ्यूल निर्धारित डीजल सुरक्षा विनिर्देशों को पूरा नहीं कर सका।
इसका सीधा मतलब यह है कि फिलहाल एथेनॉल-ब्लेंडेड डीजल को बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने की राह मुश्किल हो गई है। सरकार ने संसद में यह भी बताया कि इस समय डीजल में आइसोब्यूटेनॉल की ब्लेंडिंग नहीं की जा रही है, यानी एथेनॉल के साथ-साथ दूसरे अल्कोहल आधारित फ्यूल विकल्पों को लेकर भी तकनीकी और सुरक्षा पहलुओं का अध्ययन महत्वपूर्ण बना हुआ है।
पेट्रोल में 20% लक्ष्य से आगे बढ़ने का कोई फैसला नहीं
वहीं, पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर भी सरकार ने फिलहाल मौजूदा 20 प्रतिशत लक्ष्य से आगे बढ़ने का कोई फैसला नहीं किया है। सरकार का कहना है कि अगर भविष्य में पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा बढ़ाने पर विचार किया जाता है, तो इसके लिए विस्तृत वैज्ञानिक और तकनीकी अध्ययन किए जाएंगे। इसके अलावा ऑटोमोबाइल कंपनियों, तेल विपणन कंपनियों और रिसर्च संस्थानों के साथ भी चर्चा की जाएगी। इससे साफ है कि सरकार केवल एथेनॉल की उपलब्धता या उत्पादन को देखकर ब्लेंडिंग बढ़ाने के पक्ष में नहीं है, बल्कि वाहन के प्रदर्शन और फ्यूल की सुरक्षा को भी महत्वपूर्ण मान रही है।
एथेनॉल की सप्लाई बढ़ाने का प्रयास
भारत में एथेनॉल की सप्लाई बढ़ाने के लिए पहले से बड़े स्तर पर खरीद की जा रही है। सरकारी तेल कंपनियों ने सितंबर 2025 में 2025-26 एथेनॉल सप्लाई ईयर के लिए करीब 1,050 करोड़ लीटर एथेनॉल खरीदने का पहला टेंडर जारी किया था। इसमें कंपनियों को लगभग 1,760 करोड़ लीटर की पेशकश मिली, जो मांगी गई मात्रा से करीब 68 प्रतिशत अधिक थी। इसके बाद 378 पंजीकृत सप्लायर्स को करीब 1,048.5 करोड़ लीटर एथेनॉल आवंटित किया गया। इससे पता चलता है कि देश में एथेनॉल उत्पादन क्षमता और सप्लाई नेटवर्क तेजी से बढ़ रहा है।
सरकार अब एथेनॉल के इस्तेमाल का एक और रास्ता तलाश रही है और वह है कुकिंग फ्यूल यानी खाना पकाने के ईंधन के रूप में इसका इस्तेमाल। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, एथेनॉल आधारित कुकिंग फ्यूल भविष्य में जीवाश्म ईंधन पर आधारित खाना पकाने के विकल्प का एक जैव ईंधन विकल्प बन सकता है। इससे घरेलू स्तर पर उपलब्ध एथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ाने के साथ-साथ आयातित LPG पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है।
LPG इक्विपमेंट रिसर्च सेंटर का प्रयास
इस दिशा में LPG इक्विपमेंट रिसर्च सेंटर (Equipment Research Centre) भी काम कर रहा है। यह Indian Oil, Hindustan Petroleum और Bharat Petroleum का संयुक्त उपक्रम है। सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों के साथ मिलकर यह संस्था एथेनॉल आधारित स्वच्छ खाना पकाने के विकल्प विकसित करने की संभावनाओं पर काम कर रही है। अगर तकनीकी और सुरक्षा मानकों को पूरा करने वाला विकल्प तैयार होता है, तो भविष्य में एथेनॉल का इस्तेमाल सिर्फ पेट्रोल ब्लेंडिंग तक सीमित नहीं रह सकता।
सरकार घरेलू एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कई आर्थिक उपाय भी कर रही है। इनमें ब्याज सहायता योजनाएं, सहकारी चीनी मिलों को मौजूदा गन्ना आधारित डिस्टिलरी को मल्टी-फीडस्टॉक प्लांट में बदलने में मदद और तेल कंपनियों तथा समर्पित एथेनॉल उत्पादकों के बीच लंबी अवधि के ऑफटेक एग्रीमेंट शामिल हैं। हालांकि, डीजल में एथेनॉल ब्लेंडिंग के मामले में सामने आई सुरक्षा समस्या यह बताती है कि हर तरह के ईंधन में जैव ईंधन मिलाना केवल उत्पादन बढ़ाने का सवाल नहीं है। इसके लिए सुरक्षा, इंजन तकनीक, भंडारण, परिवहन और पर्यावरणीय प्रभाव जैसे कई पहलुओं की गहन जांच जरूरी है।
एथेनॉल को लेकर भारत की रणनीति आगे बढ़ रही है, लेकिन डीजल में इसकी ब्लेंडिंग को फिलहाल सुरक्षा मानकों से बड़ा झटका लगा है। एथेनॉल मिलाने से डीजल का फ्लैश पॉइंट काफी कम होने के कारण यह निर्धारित मानकों में फेल हो गया। ऐसे में आने वाले समय में सरकार का फोकस पेट्रोल ब्लेंडिंग के साथ-साथ एथेनॉल के नए और सुरक्षित उपयोग तलाशने पर रह सकता है।
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