उदाहरण के तौर पर अगर कर्मचारी की सैलरी हर साल औसतन 5% बढ़ती है, तो 60 साल की उम्र तक अनुमानित EPF कॉर्पस करीब ₹3-3.2 करोड़ हो सकता है। अगर सालाना वेतन वृद्धि 8% रहती है, तो यही कॉर्पस बढ़कर करीब ₹4.5-5 करोड़ तक पहुंच सकता है। वहीं, 10% की औसत सालाना वेतन वृद्धि होने पर रिटायरमेंट तक EPF कॉर्पस करीब ₹6.2-6.5 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है, यानी ₹15 लाख की मौजूदा सालाना सैलरी पर ₹5 करोड़ का लक्ष्य संभव हो सकता है, लेकिन इसके लिए लंबे समय तक लगातार सैलरी ग्रोथ और पर्याप्त EPF योगदान जरूरी होगा। इसका मतलब यह नहीं है कि हर ₹15 लाख सालाना कमाने वाला व्यक्ति अपने आप ₹5 करोड़ जमा कर लेगा।
60 साल की उम्र में अनुमानित EPF कॉर्पस
| वार्षिक वेतन वृद्धि | 60 साल की उम्र में अनुमानित EPF कॉर्पस |
|---|---|
| 5% | ₹3.0–3.2 करोड़ |
| 8% | ₹4.5–5.0 करोड़ |
| 10% | ₹6.2–6.5 करोड़ |
चॉइस वेल्थ (Choice Wealth) के CEO निकुंज शराफ के मुताबिक EPF की सबसे बड़ी ताकत इसकी मजबूरी वाली बचत और लंबी अवधि की कंपाउंडिंग है। कर्मचारी के हाथ में आने से पहले ही पैसा निवेश में चला जाता है, इसलिए बाजार के उतार-चढ़ाव के समय निवेश रोकने या पैसा निकालने का फैसला नहीं करना पड़ता। तीन दशकों तक लगातार योगदान और कंपाउंडिंग का असर काफी बड़ा हो सकता है। लेकिन, यहां एक बेहद महत्वपूर्ण बात है, जिसे नौकरीपेशा लोगों को जरूर जांचना चाहिए।
EPF का योगदान आपकी वास्तविक बेसिक सैलरी (Basic Salary) पर हो रहा है या सिर्फ ₹15,000 की वैधानिक वेतन सीमा पर? यही अंतर आपके रिटायरमेंट कॉर्पस में करोड़ों रुपये का फर्क पैदा कर सकता है। कई कंपनियों में EPF योगदान वास्तविक बेसिक सैलरी के आधार पर नहीं, बल्कि लागू वैधानिक सीमा के आधार पर किया जाता है। ऐसी स्थिति में ₹15 लाख सालाना कमाने वाला कर्मचारी भी अपेक्षाकृत कम EPF योगदान कर सकता है। एक्सपर्ट के अनुसार, अगर PF योगदान ₹15,000 की वेतन सीमा पर ही सीमित है, तो लंबे करियर के बाद बनने वाला कॉर्पस करीब ₹35-40 लाख के आसपास रह सकता है, यानी वास्तविक बेसिक सैलरी पर योगदान होने और सीमित योगदान होने के बीच अंतर कई करोड़ रुपये तक हो सकता है।
इसलिए सबसे पहले अपनी कंपनी की EPF नीति और सैलरी स्लिप जरूर जांचें। यह भी समझना जरूरी है कि EPF में जमा होने वाला पैसा रिटायरमेंट के समय एक बड़ा कॉर्पस जरूर बना सकता है, लेकिन ₹5 करोड़ आज और ₹5 करोड़ 30 साल बाद एक जैसी रकम नहीं होगी। महंगाई लंबे समय में पैसे की खरीदारी क्षमता को काफी कम कर देती है। उदाहरण के लिए, अगर महंगाई औसतन 6% सालाना रहती है, तो आज ₹1 लाख महीने में चलने वाला खर्च 30 साल बाद करीब ₹5.7 लाख प्रति माह हो सकता है। इसलिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि रिटायरमेंट के समय आपके पास कितने करोड़ रुपये होंगे; यह भी देखना जरूरी है कि उस समय उन पैसों से कितनी चीजें खरीदी जा सकेंगी।
रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली मासिक आय के नजरिए से भी तस्वीर समझना जरूरी है। अगर किसी व्यक्ति के पास रिटायरमेंट के समय ₹3 करोड़ का कॉर्पस है और वह सालाना 4% की निकासी दर अपनाता है, तो शुरुआती स्तर पर करीब ₹1 लाख प्रति माह की आय बन सकती है। ₹5 करोड़ के कॉर्पस पर यह लगभग ₹1.67 लाख प्रति माह और ₹6.5 करोड़ पर करीब ₹2.17 लाख प्रति माह हो सकती है। हालांकि, ये सिर्फ अनुमान हैं और वास्तविक रिटायरमेंट आय निवेश के रिटर्न, महंगाई, टैक्स, निकासी की रणनीति और कॉर्पस की अवधि पर निर्भर करेगी।
रिटायरमेंट कॉर्पस और अनुमानित मासिक आय
| रिटायरमेंट कॉर्पस | अनुमानित मासिक आय |
|---|---|
| ₹3 करोड़ | ₹1 लाख |
| ₹5 करोड़ | ₹1.61 लाख |
| ₹6.5 करोड़ | ₹2.1 लाख |
यही कारण है कि एक्सपर्ट EPF को रिटायरमेंट प्लानिंग की नींव मानने की सलाह देते हैं, लेकिन पूरी रिटायरमेंट योजना केवल EPF पर निर्भर रखने से बचने को कहते हैं। लंबी अवधि के लिए NPS, अपनी जोखिम क्षमता के अनुसार इक्विटी म्यूचुअल फंड और अतिरिक्त सुरक्षित रिटायरमेंट बचत के लिए VPF जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। NPS रिटायरमेंट केंद्रित निवेश के साथ उपलब्ध कर लाभों के लिहाज से उपयोगी हो सकता है, जबकि इक्विटी म्यूचुअल फंड लंबी अवधि में महंगाई को मात देने की क्षमता दे सकते हैं। VPF उन निवेशकों के लिए उपयोगी हो सकता है, जो EPF जैसे अपेक्षाकृत सुरक्षित निवेश में अतिरिक्त योगदान करना चाहते हैं।
₹15 लाख सालाना सैलरी से केवल EPF के जरिए ₹5 करोड़ का रिटायरमेंट कॉर्पस बनना संभव तो है, लेकिन यह निश्चित नहीं है। इसका सबसे बड़ा आधार आपकी बेसिक सैलरी (Basic Salary), EPF योगदान, सैलरी बढ़ने की गति, ब्याज दर और नौकरी के दौरान किसी निकासी न करने पर रहेगा। अगर सैलरी तेजी से बढ़ती है और वास्तविक बेसिक पे पर पर्याप्त EPF योगदान होता है, तो ₹5 करोड़ का आंकड़ा हासिल किया जा सकता है। लेकिन महंगाई और रिटायरमेंट के 25-30 साल लंबे दौर को देखते हुए केवल EPF पर निर्भर रहना जोखिमपूर्ण हो सकता है। बेहतर रणनीति यही है कि EPF को मजबूत आधार बनाकर उसके साथ अलग-अलग निवेश साधनों का संतुलित पोर्टफोलियो तैयार किया जाए, ताकि रिटायरमेंट के बाद सिर्फ बड़ा कॉर्पस ही नहीं, बल्कि लंबे समय तक टिकने वाली आय भी सुनिश्चित हो सके।
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