सफल कारोबारी से राजनेता बने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने हर रिश्ते को फायदे और नुकसान के नजरिये से देखते है, लेकिन कूटनीतिक इंजीनियर समझे जाने वाले चीन के अपने दौरे को लेकर उन्होंने केवल इतना भर कहा कि यह सिर्फ व्यापार नहीं, वैश्विक रणनीतिक संतुलन के लिए भी महत्वपूर्ण है। चूंकि अमेरिका और चीन एक दूसरे के सहयोगी और प्रतिस्पर्धी दोनों समझे जाते हैं, इसलिए लगभग एक दशक के अन्तराल पर हुई उनकी यह यात्रा के कूटनीतिक मायने अहम समझे जाते हैं, क्योंकि उनकी इस मुलाकात की सफलता और विफलता का असर पूरी दुनिया पर निःसंदेह पड़ेगा।
गौरतलब है कि पिछले साल यानी अक्टूबर 2025 में जब आखिरी बार ट्रंप की चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग से मुलाकात हुई थी, तब उनके बीच मुख्य मुद्दा टैरिफ था, लेकिन अब बदलते वैश्विक हालात में जाहिर तौर पर ईरान भी होगा। क्योंकि पश्चिम एशिया संकट ने दोनों देशों के लिए मुश्किलें बढ़ाई है। इसलिए स्वाभाविक बात है कि आपसी तनाव के बावजूद वे सहयोग का रास्ता तलाशने की कोशिश करेंगे। चूंकि लगभग एक दशक बाद यानी 2017 के बाद कोई अमेरिकी राष्ट्रपति 2026 में चीन पहुंचा है। हालांकि, टैरिफ वॉर की वजह से माना जाता है कि ट्रंप का रुख पेइचिंग को लेकर कठोर है।
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समझा जाता है कि अपने पहले कार्यकाल में ही उन्होंने यानी ट्रंफ ने चीन से होने वाले आयात पर टैरिफ की घोषणा की थी। जबकि दूसरे टर्म में वह इस लड़ाई को और आगे ले गए और 125% तक भारी भरकम टैरिफ तक जड़ दिया। हालांकि दुनियावी रेयर अर्थ मिनरल्स पर चीनी नियंत्रण की वजह से आखिरकार ट्रंप को झुककर समझौता करना पड़ा था, अन्यथा उनका कारोबारी हित प्रभावित होता। ऐसे में टैरिफ वॉर भले थम गई हो, पर अमेरिका और चीन के बीच की पारस्परिक होड़ कायम है और वह नित्य नए स्वरूप में उभरकर सामने आ ही जाती है। चूंकि दोनों देश एक-दूसरे पर दबाव बनाने की कोशिश करते रहते हैं, पर इतना नहीं जिससे बात ज्यादा बिगड़े।
हाल के अमेरिका/इजरायल और ईरान युद्ध के दौरान भी कुछ यही देखने को मिला है। भले ही ईरान की आर्थिक व सामरिक मदद के आरोप में अमेरिका ने कुछ चीनी कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई की, और चीन ने भी पलटवार करते हुए वॉशिंगटन की नीतियों का विरोध किया, लेकिन सब कुछ नियंत्रण में रहकर हुआ। इसकी ठोस वजह उनकी आपसी निर्भरता और पारस्परिक जरूरत भी है, जिसे समझने की जरूरत है। आपको यह मालूम होना चाहिए कि चीन के लिए अमेरिका आज भी सबसे बड़ा बाजार है। हालांकि इस साल चीनी निर्यात में करीब 10% की कमी आई है। चीन की निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था के लिए यह झटका है।
दिलचस्प बात तो यह है कि खाड़ी देशों में भी चीन का निर्यात घटा है। मसलन, तेहरान (ईरान) का सबसे बड़ा तेल खरीदार होने के नाते भी उसकी परेशानी बढ़ रही है। लिहाजा चीन चाहता है कि युद्ध जल्दी थमे। भारत की भी यही सोच है। वहीं दूसरी ओर, ट्रंप को ईरान पर समर्थन और निवेश के लिए चीन चाहिए। इसीलिए वह अपने साथ कई बड़े उद्यमियों को लेकर बीजिंग पहुंचे हैं। चूंकि अमेरिका इस दौरे से बड़ी डील की उम्मीद कर रहा है, खासकर बोइंग विमानों की। इसलिए आलोचकों को डर है कि कहीं ताइवान पर ट्रंप नरम न पड़ जाएं। अमेरिकी हित में वह ऐसा कर सकते है।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि चूंकि इस समय दोनों रसूखदार नेता घरेलू मोर्चे पर विविध असहज स्थितियों में फंसे हुए हैं। लिहाजा उनकी कोशिश यही होगी कि इस मुलाकात से कुछ बड़ा हासिल किया जाए। यदि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं पारस्परिक सहयोग के रास्ते पर बढ़ती है और ईरान में शांति कायम होती है, तो यूक्रेन सहित सभी का फायदा होगा।
# आखिर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के चीन दौरे पर भारत की नज़र क्यों है?
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चीन दौरे पर दुनियाभर की निगाहें लगी हुई हैं। ऐसे में स्वाभाविक बात है कि भारत भी अपने दोनों प्रतिस्पर्धियों पर नजर रखेगा। उल्लेखनीय है कि विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने भी इससे जुड़े एक सवाल पर कहा भी है कि भारत के कई देशों के साथ रिश्ते है। कई देशों के साथ साझेदारी आगे बढ़ रही है। चूंकि विभिन्न देशों के बीच इस तरह का दौरा होता रहता है और जब भी इस तरह के दौरे होते हैं तो भारत देखता है कि उसमें क्या बदलाव आया है- या फिर क्या गतिविधियां हुई। ऐसा इसलिए किया जाता है कि राष्ट्रहित के अनुरूप नीतियां संशोधित होती रहें।
चूंकि भारत हाल के वर्षों में अमेरिका भारत का अहम रणनीतिक साझेदार बनकर उभरा है। दूसरी ओर चीन भी भारत का अहम पड़ोसी देश है, जिसके साथ सीमा विवाद के बाद भी रिश्ते व्यवहारिक समझ पर वापस लौट रहे है। ऐसे में दोनों देशों के आपसी संबंध और इस दौरे के निष्कर्ष भी भारत पर असर डालेगा। अमेरिका और चीन के रिश्ते एक लंबे वक्त तक असहजता के दायरे में रहे, जिसके जियोपॉलिटिकल प्रभाव से भारत भी अछूता नहीं रहा है। ट्रंप का यह दौरा 2017 के बाद हो रहा है। चीन पहुंचने पर बुधवार को ट्रंप का स्वागत उपराष्ट्रपति ने किया, जो 2017 से अच्छा स्वागत होने को दर्शाता है।
चीन मामलो के जानकार बताते हैं कि भारत जानना चाहेगा कि ट्रंप और चिनफिंग के बीच बातचीत का क्या निष्कर्ष निकला। हाल के वर्षों में प्रशांत महासागर में जिस तरह चीन का प्रभाव बढ़ा है, इसी बैलेस ऑफ पावर के मद्देनजर अमेरिका और भारत रणनीतिक और सामरिक मुद्दों पर लगातार नजदीकी स्तर पर काम करते रहे। ऐसे में अमेरिका और चीन अपने सबंधों को अगर फिर से नया आयाम देने का फैसला करते है तो अमेरिका व चीन दोनों के रिश्तों के मुताबिक भारत को भी अपनी विदेश नीति में बदलाव करना होगा।
– कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक
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