पहला, ऊर्जा सुरक्षा सबसे बड़ा लक्ष्य है, क्योंकि भारत दुनिया का बड़ा तेल आयातक देश है। ईरान संकट और पश्चिम एशिया में तनाव के कारण तेल कीमतें बढ़ रही हैं। ऐसे समय में यूएई दौरा भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने का प्रयास माना जा रहा है। लिहाजा भारत और यूएई के बीच रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारण, एलपीजी (LPG) सप्लाई, ऊर्जा निवेश, समुद्री सुरक्षा जैसे अहम समझौते हुए हैं। इससे संकेत मिलता है कि भारत भविष्य के किसी बड़े वैश्विक ऊर्जा संकट के लिए खुद को सुरक्षित करना चाहता है।
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दूसरा, पश्चिम एशिया में भारत की रणनीतिक पकड़ बढ़ रही है, क्योंकि यूएई ने पीएम मोदी का असाधारण स्वागत किया- एफ-16 एस्कॉर्ट और राष्ट्रपति स्तर की अगवानी- यह दिखाता है कि भारत अब केवल “तेल खरीदने वाला देश” नहीं बल्कि एक रणनीतिक साझेदार बन चुका है।
इसके मायने ये निकलते हैं कि पाकिस्तान की पारंपरिक खाड़ी पकड़ कमजोर होगी और भारत की अरब देशों में स्वीकार्यता बढ़ती जाएगी। इससे रक्षा और टेक्नोलॉजी सहयोग का विस्तार भी होगा।
तीसरा, यूरोप के साथ नई तकनीकी साझेदारी विकसित होगी, क्योंकि नीदरलैंड, स्वीडन और नॉर्वे का चयन बहुत रणनीतिक माना जा रहा है। चूंकि इन देशों से भारत सेमीकंडक्टर तकनीक, हरित ऊर्जा, जल प्रबंधन, एआई (AI) और रक्षा तकनीक और आर्कटिक एवं समुद्री सहयोग
को मजबूत करना चाहता है। विशेषकर सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भारत चीन पर निर्भरता कम करना चाहता है। इसलिए इस पहल के अपने रणनीतिक मायने हैं।
चौथा, चीन और अमेरिका दोनों को संतुलित संदेश देने के लिए पीएम मोदी का यह दौरा “मल्टी-अलाइनमेंट” नीति का हिस्सा भी है, इससे अमेरिका के साथ साझेदारी, रूस से संबंध, अरब देशों से सामरिक निकटता, यूरोप के साथ तकनीकी सहयोग, चीन के प्रभाव का संतुलन बढ़ेगा। चूंकि भारत यह संदेश देना चाहता है कि वह किसी एक गुट का हिस्सा नहीं बल्कि स्वतंत्र वैश्विक शक्ति है।
पांचवां, भारत को निवेश हब बनाने की कोशिश यूएई द्वारा भारत में 5 अरब डॉलर निवेश की घोषणा महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इससे इंफ्रास्ट्रक्चर, बैंकिंग, लॉजिस्टिक्स, बंदरगाह, ऊर्जा क्षेत्र में निवेश बढ़ सकता है। यह “मेक इन इंडिया” और “भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब” बनाने की रणनीति से जुड़ा है।
छठा, घरेलू राजनीति के संकेत के नजरिए से दिलचस्प बात यह है कि एक तरफ पीएम मोदी जनता से ईंधन बचाने, विदेशी यात्राएं कम करने और विदेशी मुद्रा बचाने की अपील कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ खुद बड़े वैश्विक दौरे कर रहे हैं। इसका राजनीतिक संदेश यह जाएगा कि कठिन वैश्विक समय में सक्रिय नेतृत्व पीएम दे रहे हैं और भारत संकट में भी वैश्विक केंद्र बना हुआ है। इससे पीएम मोदी की व्यक्तिगत कूटनीतिक छवि मजबूत होकर चमकेगी।
सातवां, भारत की वैश्विक छवि निर्माण के दृष्टिकोण से यह दौरा यह दिखाने का प्रयास भी है कि भारत केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि ऊर्जा, तकनीक, व्यापार और सुरक्षा में निर्णायक वैश्विक खिलाड़ी बन रहा है। विशेषकर G20 के बाद भारत अपनी “विश्व नेतृत्व” छवि को स्थायी बनाना चाहता है। इसके संभावित दीर्घकालिक प्रभाव भारत के लिए अहम साबित हो सकते हैं, क्योंकि इससे जहां ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, वहीं विदेशी निवेश बढ़ने की संभावना रहेगी।
साथ ही रक्षा-तकनीकी सहयोग विस्तार से वैश्विक प्रभाव में वृद्धि होगी। भारत की यह नई चाल चीन के लिए यूरोप और खाड़ी में भारत की सक्रियता चीन के प्रभाव को चुनौती दे सकती है। जबकि पाकिस्तान के लिए खाड़ी देशों में भारत की बढ़ती स्वीकार्यता रणनीतिक दबाव बढ़ा सकती है। वहीं, यूरोप के लिए चीन के विकल्प के रूप में भारत की अहमियत बढ़ेगी। जबकि अमेरिका के लिए भारत एक आवश्यक रणनीतिक साझेदार बना रहेगा, भले ही वह पूरी तरह अमेरिकी धड़े में न जाए।
निष्कर्ष यह निकलता है कि पीएम मोदी का यह विदेश दौरा केवल औपचारिक यात्रा नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक शक्ति संतुलन, निवेश आकर्षण, तकनीकी साझेदारी, और भारत की उभरती महाशक्ति छवि को मजबूत करने की बहुस्तरीय रणनीतिक कवायद माना जा रहा है।
– कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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