दिमाग का वह हिस्सा, जो फैसले लेने और खुद पर कंट्रोल रखने में मदद करता है, न्यूरोसाइंस के मुताबिक वह किशोरावस्था में पूरी तरह विकसित नहीं होता। ऐसे में सोशल मीडिया पर लाइक्स, कमेंट्स और लगातार स्क्रॉलिंग से दिमाग में डोपामिन बढ़ता (खुशी का एहसास) है। यही उन्हें नशे जैसी लत की तरफ धकेलता है। इसके असर से टीनएजर्स में डिप्रेशन, एंग्जायटी, अपनी बनावट को लेकर हीनभावना और आत्महत्या जैसे गंभीर जोखिम बढ़ रहे हैं। हाल ही में लॉस एंजिल्स की एक जूरी ने फैसला सुनाया कि मेटा और यूट्यूब के ‘एडिक्टिव डिजाइन’ ने एक युवा यूजर को मानसिक नुकसान पहुंचाया। इस फैसले के बाद दुनियाभर में इन प्लेटफॉर्म्स पर लगाम की मांग तेज हो गई है। ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस जैसे देशों ने पाबंदियां लगा भी दी हैं। किशोरों का दिमाग ‘अंडर कंस्ट्रक्शन’ हाईवे जैसा टीनएज दिमाग को निर्माणाधीन हाईवे की तरह समझा जा सकता है। भावनाओं वाला हिस्सा तेजी से काम करता है, लेकिन इम्पल्स (‘मन के विचार) कंट्रोल करने वाला हिस्सा अभी विकसित हो रहा होता है। इसी असंतुलन के कारण किशोर ऑनलाइन रिजेक्शन या नेगेटिव कमेंट्स उन्हें ज्यादा तोड़ते हैं। नींद कम, मोटापा बढ़ा; एंग्जायटी से सीधा संबंध सोशल मीडिया के अधिक उपयोग से कम नींद और मोटापे जैसी दिक्कतें भी सामने आ रही हैं। 8 देशों के 9,000 से ज्यादा किशोरों पर रिसर्च में प्रॉब्लमैटिक सोशल मीडिया यूज का संबंध डिप्रेशन और एंग्जायटी के ऊंचे स्तर से बताया गया है। कनाडा के युवाओं में आत्महत्या मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। दोस्ती का भ्रम, असल में बढ़ता अकेलापन ट्रायल डेटा के मुताबिक मेटा के प्लेटफॉर्म्स पर बिताया गया ज्यादातर समय दोस्तों से जुड़ने में नहीं जाता। इंस्टाग्राम पर सिर्फ 7% और फेसबुक पर 17% समय ही एक्टिव बातचीत में जाता है, बाकी समय स्क्रीन स्क्रॉल करने में निकल जाता है। इससे जुड़ाव का भ्रम बनता है, लेकिन नतीजा अकेलापन होता है।
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