दोनों पर करावल नगर थाने में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और शस्त्र अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था। अदालत ने गत 28 सितंबर के आदेश में कहा कि चश्मदीद गवाह ने आरोपियों की पहचान नहीं की और अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ अपना मामला उचित संदेह से परे साबित नहीं कर पाया है। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता आस मोहम्मद ही घटना का एकमात्र चश्मदीद गवाह था और अभियोजन पक्ष के मामले की पुष्टि के लिए न तो कोई सीसीटीवी फुटेज थी और न ही कोई अन्य चश्मदीद गवाह था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार 27 अप्रैल 2018 को आस मोहम्मद जवाहर नगर मेट्रो स्टेशन गया था, जहां तीन लड़कों ने उसका मोबाइल फोन छीनने की कथित तौर पर कोशिश की। उसके विरोध करने पर उनमें से एक ने देसी पिस्तौल से उस पर कथित तौर पर गोली चला दी, जिससे उसका दाहिने हाथ घायल हो गया। अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि पुलिस ने अगले दिन दीपक और शानू को पकड़ लिया और शिकायतकर्ता ने उनकी पहचान की।
इसके बाद पुलिस ने शानू की निशानदेही पर एक देसी पिस्तौल बरामद की। हालांकि, अदालत के समक्ष पेश होने पर शिकायतकर्ता ने इस बात से इनकार किया कि दोनों आरोपी हमलावर थे। उसने पहले उनकी पहचान किए जाने की बात से भी इनकार किया।
अदालत ने कहा, ‘‘क्योंकि आरोपियों को अपराध से जोड़ने वाला एकमात्र गवाह अभियोजन पक्ष के मामले के समर्थन में नहीं आया, इसलिए आरोपियों की हमलावरों के रूप में पहचान साबित नहीं हो सकी।’’
अदालत ने कहा कि चश्मदीद गवाह के अपने बयान से मुकर जाने, हथियार की संदिग्ध बरामदगी और फोरेंसिक साक्ष्य से कोई संबंध स्थापित नहीं होने के कारण अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ अपना मामला उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।
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