धर्मशाला में बुद्ध पूर्णिमा (वेसाक) के पावन अवसर पर शुक्रवार, 1 मई को धर्मशाला के प्रसिद्ध कालचक्र मंदिर में एक भव्य प्रार्थना समारोह का आयोजन किया गया। इस विशेष अवसर पर तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा स्वयं उपस्थित रहे। उन्होंने विश्व शांति, आपसी भाईचारे और समस्त जीव जगत के कल्याण के लिए विशेष पूजा-अर्चना की। समारोह के दौरान नामग्याल मठ के भिक्षुओं ने तिब्बती परंपरा के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए। पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूँज के बीच बुद्ध शाक्यमुनि के जन्म, ज्ञान प्राप्ति और उनके परिनिर्वाण की स्मृति में विशेष प्रार्थनाएँ की गईं। पूरे मंदिर परिसर में इस दौरान गहरी आध्यात्मिक शांति और भक्ति का माहौल बना रहा। बौद्ध की शिक्षाओं का पढ़ना पर्याप्त नहीं, व्यवहार में उतारें वैश्विक बौद्ध समुदाय को संबोधित करते हुए दलाई लामा ने कहा कि 2500 वर्ष पूर्व भगवान बुद्ध द्वारा फैलाया गया ज्ञान का प्रकाश आज भी दुनिया के लिए उतना ही प्रासंगिक है। उन्होंने अनुयायियों को प्रेरित करते हुए कहा कि हमें केवल नाम का बौद्ध नहीं, बल्कि ’21वीं सदी का बौद्ध’ बनना चाहिए। उनके अनुसार केवल शिक्षाओं को सुनना या पढ़ना पर्याप्त नहीं है। बुद्ध के संदेशों पर गहराई से मनन करना और उन्हें अपने व्यवहार में उतारना अनिवार्य है। करुणा और अहिंसा ही एकमात्र मार्ग अपने संबोधन में दलाई लामा ने ‘आश्रित उत्पत्ति’ के सिद्धांत पर जोर दिया और कहा कि किसी भी जीव को हानि न पहुँचाना ही सबसे बड़ा धर्म है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय की वैश्विक चुनौतियों का समाधान केवल करुणा और ज्ञान के मार्ग पर चलकर ही संभव है। उन्होंने विश्वास जताया कि जब लोग बुद्ध की शिक्षाओं को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएंगे, तभी एक सुखी और मानवीय विश्व का निर्माण होगा। समस्त विश्व को दिया आशीर्वाद समारोह के समापन पर दलाई लामा ने सभी बौद्ध अनुयायियों को बुद्ध पूर्णिमा की बधाई दी। उन्होंने समस्त मानवता के लिए अपनी मंगलकामनाएं प्रेषित कीं और प्रार्थना की कि करुणा का यह मार्ग हर हृदय में शांति लेकर आए।
Discover more from Hindi News Blogs
Subscribe to get the latest posts sent to your email.