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- Childhood Myopia Reason; Nearsightedness AIOS Guidelines | High Eye Power Treatment
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आजकल बच्चों का ज्यादातर वक्त मोबाइल, टैबलेट और टीवी स्क्रीन के सामने बीतता है। उनकी आउटडोर एक्टिविटी कम हो रही है। इस बदलती लाइफस्टाइल का असर उनकी आंखों पर भी पड़ रहा है। इसके कारण मायोपिया (दूर का कम दिखना) के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।
‘नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन’ की एक स्टडी के मुताबिक, 2050 तक दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी को चश्मा लगाना पड़ सकता है। भारत में शहरी इलाकों में करीब 14% बच्चों को मायोपिया है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में भी पिछले एक दशक में तेजी से मामले बढ़े हैं।
इसी खतरे को देखते हुए ‘ऑल इंडिया ऑप्थेल्मोलॉजिकल सोसायटी’ (AIOS) ने बच्चों में मायोपिया की रोकथाम और मैनेजमेंट को लेकर नेशनल गाइडलाइन जारी की है। इसमें रेगुलर आंखों की जांच, स्क्रीन टाइम कम करने और रोजाना कम-से-कम दो घंटे आउटडोर एक्टिविटी जैसे उपायों पर जोर दिया गया है।
इसलिए आज ‘जरूरत की खबर’ में जानेंगे कि-
- बच्चों में मायोपिया क्यों बढ़ रहा है?
- मायोपिया का पता कैसे लगाएं?
- मायोपिया के रिस्क से बच्चों को कैसे बचाएं?
एक्सपर्ट- डॉ. रीना अग्रवाल, सीनियर कंसल्टेंट, ऑप्थेल्मोलॉजी, श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट, दिल्ली
सवाल- छोटे बच्चों में बढ़ता मायोपिया ‘पब्लिक हेल्थ इश्यू’ क्यों बन रहा है?
जवाब- इसकी सबसे बड़ी वजह कम उम्र में मायोपिया की शुरुआत, तेजी से बढ़ता स्क्रीन टाइम और घटती आउटडोर एक्टिविटी है। इसका असर बच्चों की पढ़ाई और फ्यूचर की प्रोडक्टिविटी पर भी पड़ता है। साथ ही हेल्थ सिस्टम पर आर्थिक बोझ भी बढ़ता है। इसलिए यह समस्या व्यक्तिगत स्तर से आगे बढ़कर पब्लिक हेल्थ इश्यू का विषय बन गई है। पॉइंटर्स से समझिए-
- मोबाइल, टीवी और ऑनलाइन क्लासेज के कारण बच्चे लंबे समय तक स्क्रीन देख रहे हैं।
- बच्चे पहले की तुलना में बहुत कम धूप/खुले वातावरण में समय बिता रहे हैं। इससे आंखों का नेचुरल फोकस डेवलपमेंट नहीं हो पा रहा है।
- शहरों में इनडोर लाइफस्टाइल और सीमित खेल के मैदान भी बड़ा कारण हैं।
सवाल- AIOS (ऑल इंडिया ऑप्थेल्मोलॉजिकल सोसायटी) ने क्या चेतावनी दी है?
जवाब- AIOS ने कहा है कि बच्चों में मायोपिया का रिस्क तेजी से बढ़ रहा है। इसका कारण बदलती लाइफस्टाइल (जैसे ज्यादा मोबाइल-स्क्रीन का इस्तेमाल और बाहर खेलने की कम आदत) है। बचाव के लिए स्कूल, पेरेंट्स और हेल्थ सिस्टम तीनों को मिलकर काम करना होगा।
AIOS के मुताबिक, अगर इस समस्या को अभी कंट्रोल नहीं किया गया तो आगे चलकर बच्चों में गंभीर आई प्रॉब्लम और विजन से जुड़े कॉम्प्लिकेशन्स का रिस्क हो सकता है।
सवाल- AIOS ने क्या गाइडलाइन जारी की है?
जवाब- इसमें बच्चों में बढ़ते मायोपिया को रोकने और कंट्रोल करने के लिए जरूरी सलाह दी गई है। ग्राफिक में देखिए-

गाइडलाइन में मायोपिया कंट्रोल करने के लिए कुछ मेडिकल ऑप्शंस भी बताए गए हैं। जैसे-
- एट्रोपिन आई ड्रॉप्स।
- मायोपिया-कंट्रोल स्पेक्टेकल्स।
- ऑर्थोकेरेटोलॉजी लेंस।
- सॉफ्ट मल्टीफोकल कॉन्टैक्ट लेंस।
लेकिन इन्हें केवल डॉक्टर से कंसल्ट करने के बाद ही इस्तेमाल की सलाह दी गई है।
सवाल- मायोपिया क्या है?
जवाब- मायोपिया यानी निकट दृष्टि दोष। यह आंखों की एक कॉमन प्रॉब्लम है।
- यह ऐसी आई कंडीशन है, जिसमें रिफरेक्टिव एरर के कारण व्यक्ति को दूर की चीजें ब्लर दिखने लगती हैं।
- इसमें व्यक्ति को पास की चीजें पहले की ही तरह स्पष्ट दिखाई देती रहती हैं।
- ऐसा तब होता है, जब कॉर्निया ज्यादा कर्व्ड हो जाता है।
सवाल- क्या यह सिर्फ ‘चश्मा लगने’ की समस्या है या गंभीर बीमारी भी बन सकती है?
जवाब- मायोपिया केवल चश्मा लगाने तक सीमित समस्या नहीं है। सामान्य मामलों में इसे चश्मे या कॉन्टैक्ट लेंस से आसानी से मैनेज किया जा सकता है।
वहीं अगर यह ज्यादा बढ़ जाए तो यह आंखों की गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है।

सवाल- बच्चों में मायोपिया इतनी तेजी से क्यों बढ़ रहा है?
जवाब- बच्चों में मायोपिया बढ़ने की मुख्य वजह आज की बदलती लाइफस्टाइल है। खासकर स्क्रीन टाइम ज्यादा और आउटडोर एक्टिविटी घटने के कारण ऐसा हो रहा है। आंखों की ग्रोथ बचपन में होती है। इस दौरान अनहेल्दी लाइफस्टाइल के कारण मायोपिया का रिस्क बढ़ सकता है।
सवाल- किन बच्चों में मायोपिया का रिस्क ज्यादा होता है?
जवाब- कुछ बच्चों को मायोपिया का रिस्क ज्यादा होता है। ग्राफिक में देखिए-

सवाल- मायोपिया कितना खतरनाक हो सकता है?
जवाब- सामान्य मायोपिया आमतौर पर सिर्फ चश्मे तक सीमित रहता है, लेकिन ज्यादा पावर (हाई मायोपिया) होने पर यह कई गंभीर कॉम्प्लिकेशन्स हो सकते हैं।
सवाल- क्या मायोपिया ठीक भी हो सकता है?
जवाब- मायोपिया को पूरी तरह ‘ठीक’ (रिवर्स) करना आमतौर पर संभव नहीं होता, क्योंकि यह आंख की बनावट (लंबाई या कॉर्निया की कर्व) से जुड़ा होता है। लेकिन इसे कंट्रोल और मैनेज किया जा सकता है।
सवाल- मायोपिया का इलाज क्या है?
जवाब- मायोपिया का कोई ‘एक स्थायी इलाज’ नहीं है, जो इसे पूरी तरह खत्म कर दे। हालांकि, सही मैनेजमेंट से चश्मे का पावर कंट्रोल किया जा सकता है।
चश्मा- सबसे आसान और सेफ ऑप्शन है।
लो-डोज एट्रोपिन आई ड्रॉप्स- आंख की ग्रोथ को स्लो करता है।
ऑर्थो-के (ऑर्थोकेराटोलॉजी) लेंस- रात में पहनने वाले लेंस, कॉर्निया की शेप अस्थायी रूप से बदलते हैं।
कोई भी इलाज खुद से न करें। डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।
सवाल- कैसे पहचानें कि बच्चे को मायोपिया हो रहा है?
जवाब- इसके लिए कुछ संकेतों पर गौर करें। ग्राफिक में सभी संकेत देखिए-

सवाल- बच्चे की किन शिकायतों या बातों पर गौर करना जरूरी है?
जवाब- बच्चों में मायोपिया की समस्या बढ़ने के साथ कई बार शुरुआती लक्षण नजर आने लगते हैं। ग्राफिक में देखिए-

सवाल- बच्चों में मायोपिया डेवलप होने के लिए पेरेंट्स की क्या गलतियां जिम्मेदार हैं?
जवाब- बच्चों में मायोपिया बढ़ने के पीछे पेरेंट्स की कुछ कॉमन गलतियां भी बड़ी वजह बन सकती हैं। ग्राफिक में देखिए-

सवाल- पेरेंट्स को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
जवाब- हेल्दी लाइफस्टाइल और समय पर जांच से इसे काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है। जैसे-
- 5-15 साल के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम लिमिट तय करें।
- लगातार मोबाइल/टैब देखने से बचाएं।
- बेवजह स्क्रीन यूज को कंट्रोल करें।
- कम-से-कम 1-2 घंटे बाहर खेलने के लिए भेजें।
- किताब/स्क्रीन आंखों से 25-30 सेमी दूर रखें।
- लेटकर या बहुत करीब से पढ़ने से रोकें।
- पर्याप्त रोशनी में पढ़ाई करने की आदत बनवाएं।
- 20-20-20 नियम फॉलो कराएं। यानी हर 20 मिनट बाद 20 सेकेंड के लिए 20 फीट दूर देखने को कहें।
- आंखों की नियमित जांच कराएं।
- अगर नंबर बढ़ रहा है, तो डॉक्टर की सलाह फॉलो करें।
- लक्षणों को नजरअंदाज न करें।
सवाल- छोटे बच्चों के लिए आउटडोर एक्टिविटी क्यों जरूरी है?
जवाब- खेलना सिर्फ मौज-मस्ती नहीं है, यह बच्चों की बुनियादी डेवलपमेंट की जरूरत है। बाहर खेलने से न सिर्फ शरीर बल्कि आंखों, ब्रेन और इमोशनल हेल्थ का भी संतुलित विकास होता है।
आंख
- प्राकृतिक रोशनी (सनलाइट) आंखों की ग्रोथ को रेगुलेट करती है।
- दूर की चीजें देखने से आंखों की फोकस करने की क्षमता बेहतर होती है।
फिजिकल डेवलपमेंट
- मसल्स और हड्डियां मजबूत होती हैं।
- मोटापा और सुस्ती का जोखिम कम होता है।
- स्टैमिना और कोऑर्डिनेशन बेहतर होता है।
ब्रेन और लर्निंग पर असर
- फोकस और कंसन्ट्रेशन बढ़ता है।
- क्रिएटिविटी और प्रॉब्लम-सॉल्विंग स्किल्स विकसित होती हैं।
- स्क्रीन से ब्रेक मिलने से मेंटल फटीग कम होता है।
इमोशनल और सोशल ग्रोथ
- बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ता है।
- टीमवर्क और सोशल स्किल्स सीखता है।
- स्ट्रेस और चिड़चिड़ापन कम होता है।
सवाल- बच्चों का स्क्रीन टाइम कैसे कम करें?
जवाब- स्क्रीन टाइम कम करने के लिए स्मार्ट रूटीन और व्यवहार में बदलाव जरूरी है। अगर सही तरीके अपनाए जाएं, तो बच्चे खुद-ब-खुद स्क्रीन से दूरी बनाने लगते हैं। पॉइंटर्स में देखिए-
- स्क्रीन टाइम फिक्स करें।
- घर में नो-स्क्रीन जोन बनाएं।
- बच्चों को आउटडोर एक्टिविटी के लिए प्रोत्साहित करें।
- उन्हें इनडोर एक्टिविटीज कराएं, जैसे- बुक्स, पजल, ड्रॉइंग।
- सोने से 1 घंटा पहले स्क्रीन बंद करें।
- खाने के दौरान स्क्रीन पूरी तरह बंद रखें।
- पेरेंट्स खुद रोल मॉडल बनें (कम स्क्रीन यूज करें)।
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