कैंसर के इलाज को लेकर वैज्ञानिक लंबे समय से ऐसी व्यवस्था विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें मरीज की अपनी बीमारी के हिसाब से प्रतिरक्षा तंत्र को कैंसर कोशिकाओं की पहचान करना सिखाया जा सके। अब इस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रगति सामने आई है। मॉडर्ना और मर्क ने 19 अगस्त 2026 को बताया कि उनके व्यक्तिगत एमआरएनए आधारित कैंसर उपचार इंटिसमेरान ऑटोजीन ने मेलेनोमा के मरीजों पर तीसरे चरण के परीक्षण में सकारात्मक परिणाम दिए हैं।
यह उपचार वी940 या एमआरएनए-4157 के नाम से भी जाना जाता है। परीक्षण में उन मरीजों को शामिल किया गया था, जिनका उच्च जोखिम वाला मेलेनोमा ऑपरेशन के जरिए पूरी तरह निकाल दिया गया था। कुल 1,137 मरीजों पर किए गए परीक्षण में इस उपचार को पेम्ब्रोलिजुमैब के साथ दिया गया और इसकी तुलना केवल पेम्ब्रोलिजुमैब लेने वाले मरीजों से की गई।
मौजूद जानकारी के अनुसार, व्यक्तिगत टीके और पेम्ब्रोलिजुमैब के संयोजन ने कैंसर की दोबारा वापसी से मुक्त रहने की अवधि के मुख्य लक्ष्य को हासिल किया। इसके अलावा शरीर के दूसरे हिस्सों में कैंसर फैलने से मुक्त रहने की अवधि से जुड़े महत्वपूर्ण दूसरे लक्ष्य में भी सकारात्मक परिणाम मिले। कंपनियों के मुताबिक दोनों सुधार आंकड़ों की दृष्टि से महत्वपूर्ण और मरीजों के लिए उपयोगी रहे हैं।
तो आखिर यह व्यक्तिगत कैंसर टीका काम कैसे करता है? इसकी शुरुआत मरीज के ट्यूमर से होती है। ऑपरेशन के बाद कैंसर के ऊतक की आनुवंशिक जांच की जाती है। इसमें ऐसी आनुवंशिक गड़बड़ियां खोजी जाती हैं जो कैंसर कोशिकाओं में मौजूद होती हैं, लेकिन सामान्य कोशिकाओं में नहीं। इन बदलावों से बनने वाले असामान्य प्रोटीन या उनके हिस्सों को नवप्रतिजन कहा जाता है।
इन्हीं नवप्रतिजनों को कैंसर कोशिकाओं की पहचान के लिए एक तरह के संकेत के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। मरीज के ट्यूमर के आधार पर अलग से तैयार किया गया एमआरएनए टीका शरीर की कोशिकाओं को इन संकेतों से जुड़ी जानकारी देता है। इसका उद्देश्य प्रतिरक्षा तंत्र की टी कोशिकाओं को कैंसर कोशिकाओं को पहचानने और उन पर हमला करने के लिए तैयार करना है।
इस उपचार में पेम्ब्रोलिजुमैब को भी शामिल किया गया है। यह प्रतिरक्षा तंत्र पर लगे एक तरह के अवरोध को हटाने का काम करता है, जिससे टी कोशिकाओं को कैंसर पर हमला करने में मदद मिलती है। आसान शब्दों में कहें तो टीका प्रतिरक्षा तंत्र को यह बताने की कोशिश करता है कि किस चीज को निशाना बनाना है, जबकि पेम्ब्रोलिजुमैब उस हमले में मौजूद रुकावट को कम करता है।
गौरतलब है कि इस तकनीक की उम्मीद पहली बार नहीं जगी है। इससे पहले 157 मरीजों पर हुए दूसरे चरण के परीक्षण में भी सकारात्मक संकेत मिले थे। 2026 में सामने आए पांच साल के आंकड़ों के मुताबिक व्यक्तिगत टीके और पेम्ब्रोलिजुमैब के संयोजन से अकेले पेम्ब्रोलिजुमैब की तुलना में कैंसर की वापसी या मृत्यु का जोखिम 49 प्रतिशत और दूर तक फैलने या मृत्यु का जोखिम 59 प्रतिशत कम हुआ था।
तीसरे चरण का परीक्षण इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें पहले की तुलना में कहीं अधिक मरीज शामिल किए गए हैं। हालांकि अभी कंपनियों ने केवल शुरुआती परिणाम जारी किए हैं। मरीजों के लंबे समय तक जीवित रहने जैसे कुछ महत्वपूर्ण परिणामों पर निगरानी जारी है और विस्तृत आंकड़े बाद में चिकित्सा सम्मेलन में पेश किए जाएंगे।
बता दें कि मेलेनोमा एक गंभीर त्वचा कैंसर है। इसमें कई आनुवंशिक बदलाव पाए जा सकते हैं, जिससे प्रतिरक्षा तंत्र के लिए पहचान योग्य लक्ष्य मिलने की संभावना बढ़ती है। वर्ष 2022 में दुनिया भर में करीब 3.30 लाख नए मेलेनोमा मामलों और लगभग 60 हजार मौतों का अनुमान लगाया गया था।
इस तकनीक का परीक्षण फेफड़े, गुर्दे और मूत्राशय के कैंसर समेत अन्य बीमारियों में भी चल रहा है। हालांकि मेलेनोमा में सकारात्मक परिणाम आने का मतलब यह नहीं है कि यही उपचार हर तरह के कैंसर में समान रूप से प्रभावी होगा। अलग-अलग कैंसर की प्रकृति, आनुवंशिक बदलाव और प्रतिरक्षा तंत्र से बच निकलने की क्षमता अलग होती है।
सबसे अहम बात यह है कि इंटिसमेरान ऑटोजीन अभी आम मरीजों के लिए उपलब्ध नहीं है। सकारात्मक तीसरे चरण के परिणाम के बाद भी नियामकीय मंजूरी की प्रक्रिया बाकी है। इसके अलावा हर मरीज के ट्यूमर के हिसाब से अलग टीका तैयार करने में समय, लागत, गुणवत्ता और पहुंच जैसी चुनौतियां भी सामने रहेंगी।
फिलहाल इन नतीजों ने व्यक्तिगत कैंसर उपचार की दिशा में एक अहम कदम जरूर बढ़ाया है। यह सिर्फ एमआरएनए तकनीक का इस्तेमाल नहीं है, बल्कि मरीज के अपने ट्यूमर की आनुवंशिक जानकारी के आधार पर प्रतिरक्षा तंत्र को निशाना तय करने की कोशिश है। आने वाले वर्षों में विस्तृत आंकड़े और अन्य कैंसरों पर होने वाले परीक्षण यह तय करेंगे कि यह तकनीक कैंसर उपचार में कितनी बड़ी भूमिका निभा सकती है और उम्मीदों को वास्तविक इलाज में बदलने में कितनी सफल रहती है।
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