उल्लेखनीय है कि 23 जून 1985 को मॉन्ट्रियल से लंदन जा रहे कनिष्क विमान में आयरलैंड के तट से दूर अटलांटिक महासागर के ऊपर बम विस्फोट हुआ था। विमान में सवार सभी 329 लोगों की मौत हो गई थी। इनमें 268 कनाडाई नागरिक थे। इसी साजिश से जुड़े एक अन्य बम विस्फोट में जापान के नारिता हवाई अड्डे पर दो सामान कर्मियों की भी जान गई थी। कनाडा स्वयं इस हमले को अपने इतिहास का सबसे घातक आतंकवादी हमला मानता रहा है।
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अब 41 साल बाद पीड़ित परिवारों को बताया जा रहा है कि जांच को सीमित किया जा सकता है। 12 सितंबर को टोरंटो में हुई बैठक में कनाडा की संघीय पुलिस के अधिकारियों ने कथित तौर पर परिवारों को जांच दल का आकार घटाने और मामले को निष्क्रिय स्थिति में ले जाने की संभावित योजना की जानकारी दी। बैठक में मौजूद परिवारों की प्रतिक्रिया बेहद तीखी रही और कई लोग भावुक होकर टूट गए। परिवारों के लिए यह चार दशक से चले आ रहे न्याय के संघर्ष पर चोट है।
इसको देखते हुए कनिष्क फाउंडेशन के अध्यक्ष संजय लाजर ने कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी को लिखे पत्र में इस संभावित कदम का कड़ा विरोध किया है। लाजर ने 16 सितंबर के अपने पत्र में बताया कि उन्होंने इस हमले में अपने पिता, मां और शिशु बहन को खो दिया। चार दशक से अधिक समय तक न्याय की तलाश में लगे परिवार के सदस्य के लिए यह सवाल स्वाभाविक है कि जिस मामले को कनाडा की अपनी व्यवस्था ने कभी अपने इतिहास की सबसे जटिल और बड़ी जांचों में शामिल किया, उसे अब अचानक ठंडे बस्ते में डालने की तैयारी क्यों हो रही है?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जांच की सभी संभावित दिशाएं वास्तव में समाप्त हो चुकी हैं? यदि हां, तो कनाडा सरकार को यह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए कि कौन-कौन से रास्ते आजमाए गए, किन सबूतों की पड़ताल हुई और किन कारणों से यह निष्कर्ष निकाला गया कि अब आगे कुछ नहीं किया जा सकता। केवल नए सुराग नहीं मिलने को चार दशक पुराने मामले को निष्क्रिय करने का पर्याप्त आधार मानना क्या पीड़ित परिवारों के साथ न्याय होगा?
इस मामले का इतिहास कनाडा की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। कनाडा की न्यायमूर्ति मेजर की अध्यक्षता वाले जांच आयोग ने हमले से पहले और बाद की सुरक्षा तथा खुफिया व्यवस्था में कई गंभीर कमियों की पड़ताल की थी। खतरे से जुड़ी सूचनाओं के आदान-प्रदान, विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय, गवाहों की सुरक्षा और हमले के बाद की जांच जैसे विषय आयोग के केंद्र में रहे। यानी कनिष्क कांड केवल आतंकवादियों की साजिश की कहानी नहीं है, बल्कि यह कनाडा की संस्थागत विफलताओं का भी दस्तावेज है।
आपराधिक मुकदमों का परिणाम भी परिवारों के लिए संतोषजनक नहीं रहा। दो मुकदमे चले। इंदरजीत सिंह रेयात को विस्फोटों से संबंधित मामले में दोषी ठहराया गया, जबकि दो अन्य आरोपितों को 2005 में बरी कर दिया गया। आयोग के अनुसार इसके बाद किसी और व्यक्ति पर आरोप नहीं लगाया गया। ऐसे में 329 मौतों के पीछे मौजूद व्यापक साजिश का पूरा सच आज भी सवालों के घेरे में है।
परिवारों की नाराजगी इसलिए भी गहरी है क्योंकि उनका आरोप है कि जांच के दौरान महत्वपूर्ण साक्ष्य गायब हुए, निगरानी से जुड़ी कुछ रिकॉर्डिंग मिट गईं और कुछ गवाहों की मृत्यु हुई या उन्हें धमकियों का सामना करना पड़ा। इन दावों को आधिकारिक निष्कर्षों से अलग रखते हुए भी यह सवाल अपनी जगह कायम है कि यदि अतीत में जांच के दौरान कमियां रही हैं तो क्या उनका समाधान जांच बंद करना होना चाहिए या उन अधूरे पहलुओं को फिर से खंगालना होना चाहिए?
सबसे विचित्र बात यह है कि अब परिवारों से ही नए सुराग लाने की अपेक्षा की जा रही है। चार दशक तक जांच का भार सरकारी एजेंसियों के पास रहा। ऐसे में पीड़ितों से यह कहना कि वे नए सुराग लेकर आएं, परिवारों के लिए बेहद पीड़ादायक है। उनका सवाल है कि क्या सरकार की जांच व्यवस्था अब अपनी जिम्मेदारी पीड़ितों के कंधों पर डाल रही है?
परिवारों ने इसका विकल्प भी सामने रखा है। 1995 में कनाडा सरकार और संघीय पुलिस ने हमले के दोषियों से जुड़ी जानकारी देने पर दस लाख कनाडाई डॉलर के इनाम की घोषणा की थी, जो अब तक दावा रहित है। परिवार चाहते हैं कि इस इनाम को फिर से लागू किया जाए, राशि बढ़ाई जाए और व्यापक स्तर पर नई अपील की जाए। उनका तर्क है कि यदि पुराने सुराग खत्म हो चुके हैं तो नए सुराग पैदा करने की कोशिश क्यों न की जाए?
परिवार यह भी कह रहे हैं कि यदि मौजूदा जांच दल आगे बढ़ने में सक्षम नहीं है तो किसी दूसरे दल या अतिरिक्त विशेषज्ञता के जरिए जांच को आगे बढ़ाया जाए। आखिर जांच दल की क्षमता की सीमा को पूरे मामले की सीमा क्यों मान लिया जाए?
यहां कनाडा सरकार के सामने एक और गंभीर सवाल है। यदि सरकार स्वयं हर वर्ष इस हमले के 329 पीड़ितों को याद करती है और कनिष्क विमान विस्फोट को कनाडा के इतिहास का सबसे घातक आतंकवादी हमला मानती है, तो फिर न्याय की तलाश को प्रशासनिक निष्क्रियता के हवाले करने की नौबत क्यों आ रही है? जून 2026 में प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने भी हमले की 41वीं बरसी पर 329 पीड़ितों को याद किया था। क्या उनकी सरकार इस मामले को दबते हुए देखते रहेगी?
कनिष्क फाउंडेशन के अध्यक्ष संजय लाजर ने अपने पत्र में पूर्व प्रधानमंत्री स्टीफन हार्पर द्वारा परिवारों को दिए गए आश्वासन का भी उल्लेख किया है कि दोषियों की पहचान और मामले को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने के प्रयास जारी रहेंगे। अब यही सवाल मार्क कार्नी के सामने है। सवाल यह है कि क्या वह आश्वासन केवल स्मरण समारोहों तक सीमित रहेगा या कनाडा सरकार वास्तव में इस मामले की अधूरी कड़ियों को जोड़ने की कोशिश करेगी?
इस विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू पीड़ित परिवारों से परामर्श का है। कनिष्क त्रासदी से जुड़े कई परिवार और संगठन दशकों से इस मामले में सक्रिय रहे हैं। ऐसे में किसी एक समूह से बातचीत को सभी पीड़ित परिवारों की सहमति मान लेना भी सवालों के घेरे में आ सकता है।
भले कनिष्क कांड को 41 साल बीत चुके हैं, लेकिन समय बीतने से सवाल खत्म नहीं हुए। उलटे सवाल और ज्यादा असहज हो गए हैं। अगर साक्ष्य कमजोर हुए तो क्यों? अगर गवाह खो गए तो क्यों? अगर जांच में कमियां थीं तो उन्हें दूर करने की कोशिश कितनी हुई? और अगर अब जांच रोकने की बात हो रही है तो क्या कनाडा ने सचमुच हर संभव रास्ता आजमा लिया है?
बहरहाल, 329 लोगों की मौत का हिसाब केवल इतिहास की किताबों में दर्ज आंकड़ा नहीं है। उनके परिवार आज भी जवाब मांग रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या कनाडा 329 लोगों के लिए न्याय की तलाश को प्रशासनिक सुविधा के नाम पर समाप्त कर सकता है? चार दशक बाद भी यदि इतने सवाल अनुत्तरित हैं, तो जांच बंद करने से सवाल खत्म नहीं होंगे बल्कि वह कनाडा की व्यवस्था पर और गहरे सवाल बनकर लौटेंगे।
-नीरज कुमार दुबे
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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