साल 2002 को बॉलीवुड के इतिहास में ‘क्रांति की जंग’ के लिए याद किया जाता है. यह एक ऐसा समय था जब एक ही कहानी, एक ही क्लाइमैक्स और एक ही महान क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह की जिंदगी पर बनी 3 फिल्में एक साथ थिएटर में टकराईं. एक तरफ अजय देवगन की जबरदस्त एक्टिंग थी, तो दूसरी तरफ सनी और बॉबी देओल का जबरदस्त एक्शन और इस सबके सामने खड़ें थे सोनू सूद. मुकाबला कड़ा था, लेकिन अजय देवगन ने अपनी गंभीरता से इस बॉक्स ऑफिस की रेस में देओल परिवार और सोनू सूद को पीछे छोड़ दिया. जानें कैसे अजय देवगन ने मनोज कुमार के साथ शुरू हुए इस सफर में भगत सिंह के किरदार को अमर कर दिया.
नई दिल्ली. कुछ बॉलीवुड फिल्में ऐसी हैं जिनकी कहानियां हमेशा फ्रेश रहती हैं. शहीद भगत सिंह की बहादुरी की कहानी ‘शहीद’ उनमें से एक है, लेकिन क्या आप सोच सकते हैं कि एक ही कहानी पर बनी तीन बड़ी फिल्में एक ही साल, महीने और हफ्ते में रिलीज हों? 2002 में बॉलीवुड ने एक ऐसा समय देखा जब बॉक्स ऑफिस ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारों से गूंज उठा था. मुकाबला बहुत कड़ा था- एक तरफ नेशनल अवॉर्ड विनर अजय देवगन थे और दूसरी तरफ बॉलीवुड का सबसे ताकतवर ‘देओल खानदान’ और सोनू सूद. आज की स्पेशल रिपोर्ट में, हम आपको उन 4 फिल्मों के बारे में विस्तार से बताएंगे जो एक ही कहानी पर बनकर तैयार हुई थीं, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर सिर्फ 1 ही फिल्म सफल हो पाई.

इकलौती सफल फिल्म ‘शहीद’: आजादी के बाद से ही भगत सिंह पर फिल्में बन रही थीं, लेकिन इस महान क्रांतिकारी की कहानी को पहली बार पर्दे पर अमर करने का क्रेडिट मनोज कुमार को जाता है, जिन्हें ‘भारत कुमार’ के नाम से भी जाना जाता है. 1965 की फिल्म ‘शहीद’ बॉक्स ऑफिस पर सफल रही. उस समय, मनोज कुमार की सादगी और फिल्म के म्यूजिक (खासकर प्रेम धवन के गाने) ने दर्शकों के रोंगटे खड़े कर दिए थे. यह फिल्म ब्लॉकबस्टर साबित हुई और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्टैंडर्ड सेट किया- जब भी भगत सिंह पर कोई फिल्म बनेगी, तो उसकी तुलना मनोज कुमार से जरूर की जाएगी.

जब बॉलीवुड ‘जंग का मैदान’ बन गया: करीब 37 साल बाद, 2002 में बॉलीवुड के तीन बड़े डायरेक्टर्स को अचानक लगा कि भगत सिंह की कहानी को फिर से बताने का समय आ गया है. यह बॉलीवुड के इतिहास का सबसे बड़ा और सबसे अजीब क्लैश था. 7 जून 2002 को, दो फिल्में एक साथ थिएटर में आईं: द लेजेंड ऑफ भगत सिंह (डायरेक्टर: राजकुमार संतोषी, अजय देवगन स्टारिंग) और 23 मार्च 1931: शहीद (डायरेक्टर: गुड्डू धनोआ, बॉबी देओल और सनी देओल स्टारिंग).
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इतना ही नहीं, 2002 में सोनू सूद की फिल्म ‘शहीद-ए-आजम’ भी पाइपलाइन में थी, जो सनी देओल और अजय देवगन की फिल्म से एक हफ्ते पहले रिलीज हुई थी. वही क्लाइमैक्स- लाहौर जेल में फांसी और तीन नौजवानों की शहादत, ने दर्शकों को कन्फ्यूज कर दिया कि किसे चुनें और किस सिनेमाघरों में कौन सी फिल्म देखने जाएं.

अजय देवगन बनाम देओल ब्रदर्स: यह क्लैश सिर्फ प्रोफेशनल ही नहीं बल्कि पर्सनल भी था. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राजकुमार संतोषी असल में यह फिल्म सनी देओल के साथ बनाना चाहते थे, लेकिन क्रिएटिव मतभेदों के कारण सनी अलग हो गए. सनी देओल ने भगत सिंह पर बनी फिल्म अपने भाई बॉबी के साथ बनाने का फैसला किया.

अजय ने इस रोल के लिए काफी वजन कम किया, अपनी आंखों की चमक पर काम किया और राजकुमार संतोषी ने ऐतिहासिक तथ्यों पर काफी रिसर्च की. सनी देओल ने चंद्रशेखर आजाद का रोल किया, जबकि बॉबी को भगत सिंह के रोल के लिए चुना गया. फिल्म में भारी डायलॉग थे और ‘गदर’ की सफलता को दोहराने की कोशिश की गई थी. जब फिल्में रिलीज हुईं, तो नतीजे हैरान करने वाले थे. हालांकि दोनों फिल्में अपने ज्यादा बजट और बंटे हुए दर्शकों के कारण बॉक्स ऑफिस पर ‘हिट’ का टैग हासिल करने में नाकाम रहीं, लेकिन क्वालिटी के मामले में अजय देवगन आगे रहे.

अजय की एक्टिंग इतनी शानदार थी कि लोग उनमें असली भगत सिंह देखने लगे. इस फिल्म ने उस साल बेस्ट फीचर फिल्म का नेशनल अवॉर्ड जीता और अजय देवगन को बेस्ट एक्टर का नेशनल अवॉर्ड मिला. दूसरी तरफ, बॉबी देओल की ’23 मार्च 1931′ को दर्शकों ने पूरी तरह से रिजेक्ट कर दिया था. फिल्म में बहुत ज्यादा मेलोड्रामा था और यह किसी हिस्टोरिकल फिल्म से ज्यादा बॉलीवुड मसाला फिल्म जैसी लगती थी. सनी देओल की ‘ढाई किलो का हाथ’ भी डूबते जहाज को नहीं बचा पाई.

हारकर भी जीते अजय: अजय की फिल्म भले ही बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो गई हो, लेकिन आज भी 24 साल बाद अगर कोई भगत सिंह पर बनी सबसे अच्छी फिल्म का नाम लेता है, तो वह अजय देवगन की फिल्म ही है. इस फिल्म का म्यूजिक एआर रहमान ने दिया था. ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ और ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ जैसे गानों ने इस फिल्म को अमर कर दिया. वहीं, बॉबी देओल और सोनू सूद स्टारिंग फिल्मों को काफी हद तक भुला दिया गया है.
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