यह केवल पश्चिम बंगाल की स्थिति नहीं है। संसद और देश की अनेक विधानसभाओं की स्थिति भी इससे बहुत अलग नहीं है। पिछले कुछ वर्षों के चुनावी विश्लेषण बताते हैं कि उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, झारखंड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना सहित अनेक राज्यों में बड़ी संख्या में ऐसे जनप्रतिनिधि चुनकर आए हैं जिन पर गंभीर आपराधिक आरोप हैं। लोकतंत्र के मंदिरों में अपराध और दागी छवि वाले लोगों की बढ़ती उपस्थिति आज राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुकी है। राजनीति मूलतः लोकसेवा, नैतिक नेतृत्व और राष्ट्रनिर्माण का माध्यम मानी गई थी। महात्मा गांधी, जयप्रकाश नारायण, लाल बहादुर शास्त्री, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं ने राजनीति को मूल्य आधारित दिशा दी। लेकिन समय के साथ राजनीति में वैचारिक प्रतिबद्धता का स्थान धीरे-धीरे चुनावी गणित, धनबल और प्रभावशाली समूहों ने लेना शुरू कर दिया। आज कई राजनीतिक दल उम्मीदवार चयन में योग्यता, चरित्र और जनसेवा की बजाय “जीतने की क्षमता” को प्राथमिकता देते दिखाई देते हैं। यही कारण है कि दागी छवि वाले व्यक्तियों को भी टिकट देने में संकोच नहीं किया जाता।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र की राजनीति में आने के बाद अनेक मंचों से राजनीति के अपराधीकरण पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने संसद में और सार्वजनिक मंचों पर कई बार कहा कि राजनीति को अपराधमुक्त बनाना लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है। उन्होंने जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों के शीघ्र निपटान के लिए विशेष अदालतों की आवश्यकता पर बल दिया। किंतु चिंता का विषय यह है कि आज भी लगभग सभी राजनीतिक दलों की स्थिति समान दिखाई देती है। चुनाव जीतने की मजबूरी और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण दल अपराधी और दागी उम्मीदवारों को टिकट देने से परहेज नहीं कर पा रहे हैं। इस स्थिति के पीछे कई कारण हैं। पहला कारण है चुनावों का अत्यधिक खर्चीला होना। आज चुनाव लड़ना सामान्य व्यक्ति की क्षमता से बाहर होता जा रहा है। बड़े संसाधनों वाले और आर्थिक रूप से प्रभावशाली लोग चुनावी प्रक्रिया में अधिक सक्रिय हो रहे हैं। दूसरा कारण है बाहुबल और प्रभाव का उपयोग। कई क्षेत्रों में आज भी राजनीतिक प्रभाव स्थापित करने के लिए शक्ति प्रदर्शन को महत्वपूर्ण माना जाता है। तीसरा कारण है न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति। गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों के वर्षों तक लंबित रहने के कारण आरोपी चुनाव लड़ते रहते हैं और जनप्रतिनिधि बन जाते हैं।
राजनीति में अपराधीकरण का दूसरा बड़ा पक्ष है धनबल। पश्चिम बंगाल विधानसभा के आंकड़े बताते हैं कि 61 प्रतिशत विधायक करोड़पति हैं। यह प्रवृत्ति पूरे देश में दिखाई देती है। संसद और विधानसभाओं में करोड़पति जनप्रतिनिधियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। प्रश्न यह है कि क्या लोकतंत्र धीरे-धीरे सामान्य नागरिक की पहुंच से दूर होता जा रहा है? यदि राजनीति केवल धनवान और प्रभावशाली वर्गों तक सीमित हो जाएगी तो लोकतंत्र की समावेशी भावना कमजोर होगी। इन परिस्थितियों में नागरिक समाज और लोकतांत्रिक संगठनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। भारतीय मतदाता संगठन इस दिशा में उल्लेखनीय प्रयास कर रहा है। इसके संस्थापक रिखबचंद जैन के नेतृत्व में लंबे समय से राजनीति को स्वच्छ और अपराधमुक्त बनाने की दिशा में जनजागरण अभियान चलाए जा रहे हैं। संगठन मतदाता जागरूकता, नैतिक मतदान, स्वच्छ राजनीति और जिम्मेदार नागरिकता को बढ़ावा देने के लिए कार्य कर रहा है। लोकतंत्र को केवल चुनावी प्रक्रिया नहीं, बल्कि मूल्य आधारित व्यवस्था मानते हुए यह संगठन समाज को जागरूक करने का प्रयास कर रहा है कि मतदाता केवल जाति, धर्म, क्षेत्र या दलगत निष्ठा के आधार पर नहीं, बल्कि उम्मीदवार के चरित्र और सार्वजनिक जीवन को देखकर मतदान करें। इसी प्रकार एडीआर (ऐसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिपोर्ट) जैसे संगठन भी चुनावी पारदर्शिता और जनप्रतिनिधियों की पृष्ठभूमि सार्वजनिक करने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। इन संगठनों के कारण आज मतदाताओं को उम्मीदवारों के आपराधिक मामलों, संपत्ति और शिक्षा संबंधी जानकारी उपलब्ध हो रही है। यह लोकतंत्र को मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
राष्ट्रीय चुनाव आयोग भी इस दिशा में लगातार प्रयासरत है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद राजनीतिक दलों को उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड सार्वजनिक करने के निर्देश दिए गए हैं। उम्मीदवारों को शपथपत्र में अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि, संपत्ति और देनदारियों की जानकारी देना अनिवार्य किया गया है। चुनाव आयोग लगातार मतदाता जागरूकता अभियान चला रहा है। किंतु केवल औपचारिक प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। इन प्रयासों को अधिक तीव्र, व्यापक और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है। आज आवश्यकता है कि राजनीति के अपराधीकरण के विरुद्ध राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक आंदोलन खड़ा किया जाए। इसके लिए कुछ ठोस कदम आवश्यक हैं- पहला, जिन उम्मीदवारों पर हत्या, बलात्कार, अपहरण, भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोप न्यायालय द्वारा तय हो चुके हों, उनके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने पर गंभीर विचार होना चाहिए। दूसरा, जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों के त्वरित निपटान हेतु विशेष न्यायालयों की संख्या बढ़ाई जाए ताकि वर्षों तक मुकदमे लंबित न रहें। तीसरा, राजनीतिक दलों को दागी उम्मीदवारों को टिकट देने पर जवाबदेह बनाया जाए। उन्हें सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवार उपलब्ध होने के बावजूद दागी व्यक्ति को क्यों चुना गया। चौथा, चुनावी खर्च पर कठोर नियंत्रण और पारदर्शिता लाई जाए ताकि सामान्य और योग्य नागरिक भी राजनीति में प्रवेश कर सकें। पांचवां, मतदाता जागरूकता को जनांदोलन बनाया जाए। जब तक मतदाता स्वयं दागी उम्मीदवारों को अस्वीकार नहीं करेंगे, तब तक सुधार अधूरा रहेगा।
भारत आज जिस दिशा में बढ़ रहा है, वहां राजनीति की शुचिता और नैतिकता की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। यदि हम 2047 तक विकसित भारत बनना चाहते हैं, यदि हमें विश्वगुरु बनना है, यदि भारत को वैश्विक नेतृत्व करना है, तो राजनीति को अपराध और धनबल के प्रभाव से मुक्त करना ही होगा। आर्थिक शक्ति, तकनीकी प्रगति और वैश्विक प्रतिष्ठा तभी सार्थक होगी जब लोकतंत्र की आत्मा सुरक्षित रहेगी। राजनीति का उद्देश्य सत्ता प्राप्ति नहीं, समाज निर्माण होना चाहिए। लोकतंत्र केवल वोटों का गणित नहीं, बल्कि विश्वास, नैतिकता और जनप्रतिनिधित्व की पवित्र व्यवस्था है। यदि राजनीति अपराधमुक्त होगी तो शासन अधिक पारदर्शी होगा, जनता का विश्वास बढ़ेगा और राष्ट्रनिर्माण की गति भी तेज होगी।
आज आवश्यकता केवल सरकारों या चुनाव आयोग के प्रयासों की नहीं है, बल्कि समाज, मतदाता संगठनों, नागरिक संस्थाओं, मीडिया और जागरूक नागरिकों के संयुक्त अभियान की है। भारतीय मतदाता संगठन जैसे प्रयास इसी दिशा में आशा की किरण हैं। इन प्रयासों को राष्ट्रीय स्वरूप देने की जरूरत है। भारत के विकसित भविष्य की आधारशिला केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि स्वच्छ राजनीति भी है। क्योंकि अपराधमुक्त राजनीति ही विकसित भारत, समृद्ध भारत और विश्वगुरु भारत की वास्तविक पहचान बन सकती है।
– ललित गर्ग
लेखक,पत्रकार एवं स्तंभकार
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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