ऐसा इसलिए कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु पारस्परिक दांवपेंचों की वजह से देश का प्रधानमंत्री नहीं बन पाए थे। जहां सूझबूझ वाले दूरदर्शी नेता ज्योति बसु ने कांटे के ताज पीएम पद की पेशकश को विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया था, वहीं लालू प्रसाद के सपनों का शिकार उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने पूर्व प्रधानमंत्री द्वय देवगौड़ा और गुजराल जैसे जनाधार विहीन नेताओं को आगे करके करवा दिया।
इसे भी पढ़ें: आखिर पश्चिम बंगाल में ‘चुनावी जंगलराज’ के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई क्यों नहीं?
यूँ तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उड़ीसा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक भी सियासी बिल्ली के भाग्य से पीएम पद रूपीं छींके टूटने का इंतजार करते रह गए, लेकिन नीयत और नीति में खोंट की वजह से गच्चा खाते रहे, जबकि उम्मीद अभी भी बाकी है! अब तो कई राजनेता मुंगेरी लाल के हसीन सपने देखते रहने के आदी बन चुके हैं, जबकि किस्मत ने साथ दिया तो राजद नेता और पूर्व मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव और लोजपा रामविलास नेता व केंद्रीय कैबिनेट मंत्री चिराग पासवान भी आगे इस रेस के घोड़े बन सकते हैं। सबके दिल्ली के साथ साथ कोलकाता, रांची, भुवनेश्वर से समझदारी भरे रिश्ते हैं।
राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि षड्यंत्रकारी यूजीसी बिल से सवर्णों का विश्वास भाजपा से डिगा है और ममता बनर्जी को ब्राह्मण होने का पहली बार लाभ पश्चिम बंगाल में मिलने वाला है। वहीं, उनके जुझारू तेवर के मद्देनजर पूरे देश के सवर्ण उनपर फिदा होने को तैयार बैठे हैं। यही वजह है कि बंगाल में 250 सीटों को पार करने का उनके समर्थकों का दावा बेबुनियाद नहीं है। कांग्रेस के पूरे जनाधार को आज बंगाल में वही सहेजे हुए हैं। शायद इसलिए ही कीर्ति आजाद का मानना है कि टीएमसी (TMC) की सीटें लगातार बढ़ रही हैं—2011, 2016, 2021 में वृद्धि हुई और लोकसभा 2024 में भी 6 अतिरिक्त सीटें मिलीं। कोई एंटी-इनकंबेंसी नहीं है, बंगाल में विकास, अस्मिता और अलग संस्कृति की लड़ाई है।
उनके शब्दों में ममता को प्रधानमंत्री बनाने का कारण स्पष्ट है। आज उनके कद का कोई क्षेत्रीय नेता नहीं है। उन्होंने ममता को सबसे ताकतवर नेता बताया जो लगातार बीजेपी की खतरनाक राजनीतिक चालों से टक्कर ले रही हैं, और आने वाले समय में और मजबूत होंगी। राजनीतिक विश्लेषक भी मानते हैं कि ममता से बेहतर कोई चेहरा नहीं, खासकर इंडिया गठबंधन में उनकी भूमिका मजबूत होगी। चूंकि ये बयान 2026 बंगाल चुनाव प्रचार के दौरान आए, जहां उन्होंने बीजेपी, मोदी-शाह पर हमले किए और टीएमसी की योजनाओं (जैसे कन्याश्री, मनरेगा फंडिंग) की सराहना की।
आपको पता होना चाहिए कि ममता बनर्जी का बंगाल मॉडल महिलाओं, युवाओं, स्वास्थ्य, शिक्षा और गरीबों के कल्याण पर केंद्रित है, जो टीएमसी सरकार की प्रमुख जनकल्याणकारी योजनाओं से जाना जाता है। ये योजनाएं जीवन के विभिन्न चरणों को कवर करती हैं। जहां तक महिलाओं की योजनाएं की बात है तो लक्ष्मी भंडार योजना के तहत सामान्य महिलाओं को 1500 रुपये मासिक और SC/ST महिलाओं को 1700 रुपये मिलते हैं। जबकि रूपश्री में विवाह के लिए 25,000 रुपये सहायता दी जाती है, जिससे 22 लाख से अधिक महिलाओं को लाभ हुआ। कन्याश्री लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देती है।
वहीं, यदि युवाओं और बेरोजगारों के लिए बात की जाए तो बांग्ला युवा साथी (युवा साथी) योजना में 21-40 वर्ष के बेरोजगार युवाओं को 1500 रुपये मासिक भत्ता मिलता है। जबकि श्रमश्री प्रवासी मजदूरों को नई नौकरी तक 5000 रुपये सहायता देती है। वहीं, स्वास्थ्य और अन्य कल्याण कारी योजनाओं में स्वास्थ्य साथी स्वास्थ्य बीमा योजना चिकित्सा सुविधा प्रदान करती है। दुआरे चिकित्सा द्वार-द्वार स्वास्थ्य शिविर चलाती है। समावयती अंतिम संस्कार सहायता देती है, हर घर में पाइप पानी और पक्का घर सुनिश्चित करने वाली योजनाएं भी शामिल हैं।
चूंकि ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल में ‘जमीन से जुड़ी’ नेता माना जाता है क्योंकि उन्होंने सिंगूर और नंदीग्राम जैसे भूमि अधिग्रहण आंदोलनों के जरिए किसानों और आम जनता के हितों की रक्षा की, जो उनकी छवि को मजबूत बनाता है। हालांकि, सवर्णों (जैसे ब्राह्मण) का उन्हें ‘पूरा सपोर्ट’ मिलना एक अतिशयोक्ति है, क्योंकि उनकी राजनीति मुख्य रूप से मुस्लिम (लगभग 30%) और दलित/ओबीसी वोटबैंक पर निर्भर है।
लेकिन यूजीसी बिल विवाद से सवर्णों में उनकी पैठ लगातार बढ़ रही है।पूरे देश के सवर्ण कार्यकर्ता गोपनीय तौर पर बंगाल पहुंच रहे हैं और ममता की मदद करके सवर्ण विरोधियों को सही सबक सिखाना चाहते हैं, ताकि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की ओबीसी राजनीति हतोत्साहित हो सके। सबकुछ भीतर ही भीतर किया जा रहा है, ताकि ममता बनर्जी का पुराना वोट बैंक प्रभावित न हो।
ममता बनर्जी जमीन से जुड़ाव रखने वाली नेता हैं। ममता बनर्जी ने 2006-07 के सिंगूर (टाटा नैनो प्रोजेक्ट) और नंदीग्राम आंदोलनों में किसानों की जमीन बचाने के लिए आंदोलन किया, जिससे वामपंथी सरकार गिरी। यह उनके ‘आम आदमी की नेता’ वाली इमेज का आधार बना, जहां वे गरीबों, किसानों और दबे-कुचले वर्गों की आवाज बनीं।
टीएमसी की कल्याणकारी योजनाएं जैसे लक्ष्मीर भांडार ने ग्रामीण और एससी/एसटी वोटरों को बांधा। वहीं, सवर्ण समर्थन की हकीकत यह है कि सवर्ण (ब्राह्मण, बंगाली बाबू) टीएमसी को सीमित समर्थन देते हैं, लेकिन ‘पूरा’ नहीं—क्योंकि ममता पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगते हैं (जैसे वक्फ कानून, एसआईआर विरोध)। फिर भी उन्होंने ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित किए, पुजारियों को पेंशन/आवास दिए और खुद को ‘ब्राह्मण की बेटी’ कहा ताकि सॉफ्ट हिंदुत्व दिखाएं और बीजेपी का हिंदू वोट काटें।
जानकार बताते हैं कि यूजीसी बिल विवाद के बाद उन्होंने सवर्णों को रिझाने के लिए अपने खास लोगों को लगा दिया है। फिर भी, अपर मिडिल क्लास/सवर्णों में कुछ कुछ असंतोष है जो शासन की खराबी पर है, और इसलिए भी 2026 चुनावों में जातिगत ध्रुवीकरण बढ़ सकता है। सवाल मुखर है कि क्या पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में टीएमसी की जमीनी रणनीति से ममता बनर्जी पुनः मारेंगी बाजी?
– कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
Discover more from Hindi News Blogs
Subscribe to get the latest posts sent to your email.