संगीत की दुनिया में ‘एक नया दौर’
आशा भोसले का जन्म 8 सितंबर 1933 को सांगली, महाराष्ट्र में हुआ। पंडित दीनानाथ मंगेशकर की तीसरी बेटी के रूप में उन्होंने संगीत की बुनियाद घर में ही रखी। मात्र 15 वर्ष की उम्र में उन्होंने हिंदी फिल्मों में प्लेबैक सिंगिंग शुरू की, लेकिन असली ब्रेक 1957 में ओ.पी. नैय्यर के साथ ‘नया दौर’ फिल्म से मिला। गाना था ‘उड़े जब जब जुल्फें तेरी’ । यह गाना न सिर्फ हिट हुआ, बल्कि आशा जी को लाइमलाइट में स्थापित कर गया।
वहीं उनकी आवाज ने युवा दिलों को झूमने पर मजबूर कर दिया। लेकिन असली करिश्मा तब हुआ जब 1981 में मुजफ्फर अली की फिल्म ‘उमराव जान’ आई। रेखा की अदाकारी और आशा जी की गजलों ने मिलकर एक ऐसा जादू रचा कि आज भी वो गीत सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उस दौर में लता मंगेशकर बहनों की छाया में काम करना आसान नहीं था, लेकिन आशा जी ने अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी आवाज में एक अनोखी चंचलता थी। जो हर तरह के गाने को अपना बना लेता था।
1960-70 के दशक में आर.डी. बर्मन के साथ उनकी जोड़ी ने संगीत को नई ऊंचाइयां दीं। ‘ पिया तू अब तो आ जा’, ‘दम मारो दम’, चुरा लिया है तुमने जो दिल को’ जैसे गाने युवा पीढ़ी के लिए नशा बन गए। आशा जी ने कैबरे, डिस्को, पॉप और रोमांटिक तक हर स्टाइल को अपनी आवाज से सजाया।
उर्दू नजाकत से गाया ‘दिल चीज क्या है’
1981 में रिलीज हुई मुजफ्फर अली की फिल्म ‘उमराव जान’ ने आशा भोसले की प्रतिभा को एक नया आयाम दिया। ‘इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं’, ‘दिल चीज क्या है’और ‘ये क्या जगह है दोस्तों’जैसे गजल गीतों में उन्होंने शास्त्रीय गायकी की गहराई और उर्दू की नजाकत को इतना खूबसूरती से पिरोया कि सुनने वाला भावुक हो जाए।
हर दौर में गाने का नया स्टाइल
1986 की फिल्म ‘इजाजत’ में ‘मेरा कुछ सामान’ गीत ने आशा जी को दूसरा राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिलाया। इस गीत की गहराई और भावुकता आज भी दिल को छूती है। समय बीतता गया, पीढ़ियां बदलती गईं, लेकिन आशा जी की आवाज ने हर दौर में खुद को नया रूप दिया।
1995 में ‘रंगीला’ फिल्म आई। ए.आर. रहमान की धुन पर आशा जी ने ‘रंग रंग रंगीला रे’गाया। 62 वर्ष की उम्र में भी उनकी आवाज में वह जादू था जो उर्मिला मातोंडकर के स्टाइलिश डांस के साथ परफेक्ट मैच करता था। यह गाना साबित करता है कि संगीत में उम्र सिर्फ एक नंबर है। आवाज अगर सच्ची हो तो हर पीढ़ी को छू लेती है।
रीमिक्स और पार्टियों की जान बना ‘दम मारो दम’
अगर हम आज के नए जनरेशन की बात करें तो उनके लिए आशा भोसले का मतलब है वह ‘स्वैग’ जिसे ‘दम मारो दम’ जैसे गानों में महसूस किया जा सकता है। फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ का यह गाना आज भी रीमिक्स और पार्टियों की जान है। इस गाने में जो बिंदासपन है, वह वह नई पीढ़ी के संगीत प्रेमियों को सीधे कनेक्ट करती है। चाहे वह ‘हंगामा हो गया’ का रीमेक हो या ‘ये मेरा दिल’, आज के दौर के युवा भी उनके गानों पर थिरकने से खुद को रोक नहीं पाते हैं।
मराठी, बंगाली, गुजराती हर आवाज में छोड़ी अपनी छाप
आशा भोसले ने 20 से ज्यादा भाषाओं में 12,000 से अधिक गाने गाए। मराठी, बंगाली, गुजराती भाषाएं हर जगह उनकी आवाज ने छाप छोड़ी। उन्होंने हेलेन, जीतेंद्र, अमिताभ बच्चन, उर्मिला मातोंडकर जैसी कई अभिनेत्रियों और अभिनेताओं को अपनी आवाज दी। उनकी प्रतिभा के कारण उन्हें दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड, पद्म विभूषण, कई फिल्मफेयर अवॉर्ड्स और दो राष्ट्रीय पुरस्कार मिले।
आर.डी बरमन से लेकर ए.आर. रहमान, अनु मलिक के साथ किया काम
उन्होंने सिर्फ गाने नहीं गाए, बल्कि संगीत को लोकप्रिय बनाया। आर.डी. बर्मन के साथ उनकी जोड़ी संगीत इतिहास की सबसे सफल जोड़ियों में से एक है। बाद में उन्होंने युवा संगीतकारों जैसे ए.आर. रहमान, अनु मलिक के साथ भी काम किया और हर बार नया कमाल दिखाया।
आज भी Wedding Playlist में बजते हैं आशा भोसले के गाने
आशा भोसले के गाने आज भी रेडियो, यूट्यूब, वेडिंग प्लेलिस्ट में सबसे ज्यादा सर्च किए जाते हैं।
आशा ताई, आपकी आवाज अमर है। आपकी श्रद्धांजलि में हम बस यही कह सकते हैं कि धन्यवाद ‘सुरों की रानी’आपकी यादें और गाने हमेशा हमारे साथ रहेंगे।
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