जानवरों की आंतों से बनाया जाता था कंडोम
न्यू गिनी में बना पहला महिला कंडोम
1000 साल पुराने साक्ष्यों से पता चलता है कि मिस्र की संस्कृति में पुरुष यौन संबंध के समय प्रायः एक शीथ का उपयोग किया करते थे. इस शीथ के लिए लिनन के कपड़े का इस्तेमाल किया जाता था. सामाजिक श्रेष्ठता में आगे बढ़ने के लिए पुरुष रंगीन लिनन का इस्तेमाल करते थे. माना जाता है कि मिस्र में ट्रॉपिकल बीमारियों बिल्हार्जिया का बहुत खतरा था. इससे बचने के लिए उन्होंने लिंग के अगले भाग में पहनने वाली शीथ का आविष्कार किया. वहीं न्यू गिनी में रहने वाली प्राचीन जुकास जनजाति के लोग संभवतः सबसे पहले महिला कंडोम बनाया. यह कंडोम एक खास पौधे से बनाया जाता था जिसका एक सिरा खुला और दूसरा सिरा बंद होता था. प्याले के आकार का यह कंडोम लगभग 6 इंच लंबा होता था जिसे महिला के प्राइवेट पार्ट में घुसा दिया जाता था. यह इस तरह से फिट हो जाता था कि संबंध बनाने के दौरान जो दबाव पड़ता था उसे यह आसानी से झेल लेता था.कोलंबिया यूनिवर्सिटी में एसिसटेंड डायरेक्टर डोना ड्रकर कहती है कि पुराने जमाने में पुरुषों से ज्यादा महिला कंडोम ज्यादा पॉपुलर था.
चीन और जापान का कंडोम
रिसर्च से शुरू हुई मॉडर्न कंडोम
आधुनिक कंडोम के विकास में सबसे बड़ा शुरुआती योगदान यूरोपियन वैज्ञानिकों का था. मशहूर इतालवी शरीररचनाविद गैब्रिएले फैलोपियो (जिनके नाम पर फैलोपियन ट्यूब का नाम रखा गया) ने 1564 में कंडोम के विकास में अहम योगदान दिया. उन्होंने यौन जनित बीमारी सिफलिस से बचाव के लिए लिनन से बने एक आवरण का वर्णन किया. यह आवरण केवल लिंग के अग्रभाग को ढकता था, जिसे एक रिबन से बांधा जाता था और लार से चिकना किया जाता था.यह कंडोम सिंगल यूज के लिए नहीं था बल्कि इसे दोबारा से साफ कर इस्तेमाल किया जाता था. उन्होंने इसके लिए 1100 पुरुषों पर अध्ययन किया जिसमें शानदार सफलता मिली. फैलोपियो की रिसर्च ने आधुनिक कंडोम को सरलीकृत करने में अहम योगदान दिया. 17 वीं शताब्दी के दौरान रिबन वाले कंडोम का उपयोग गर्भनिरोधक के रूप में धड़ल्ले से होने लगा.
आधुनिक कंडोम में भारत का अहम योगदान
19वीं और 20वीं सदी में कंडोम को सरलीकृत किया गया. इस समय आविष्कारकों ने वाटरप्रूफ कपड़े, गुट्टा पेरका (पेड़ से प्राप्त लैटेक्स) और इंडियन रबर से कंडोम बनाने का प्रयास किया. भारतीय रबर का खास योगदान था लेकिन इसमें एक दिक्कत थी. शुरुआत पेड़ से प्राप्त रबर कंडोम मोटे और टूटने या झड़ने वाले होते थे. गर्म होने पर ये नरम और लचीले होते थे, लेकिन ठंडे होने पर कठोर और भंगुर हो जाते थे. इस कहानी को 1844 में वैज्ञानिक चार्ल्स गुडईयर Charles Goodyear ने सुलझा दिया. उन्होंने वल्कनीकृत रबर का पेटेंट कराया और पहला वल्कनीकृत रबर कंडोम 1855 में व्यापक रूप से बाजार में आ गया. इससे कंडोम की कीमत काफी कम हो गई और इससे कंडोम की पूरी कहानी बदल गई.
विश्व युद्ध के दौरान कंडोम की बिक्री में उछाल
1920 में आया लेटेक्स रबर
प्रथम विश्व युद्ध के तुरंत बाद कंडोम का नया प्रकार पेश किया गया. सन 1920 में लेटेक्स रबर का विकास हुआ, जिसने कंडोम को वल्कनीकृत रबर की तुलना में और भी पतला और अधिक टिकाऊ बना दिया. इसके अलावा इन्हें बनाना भी आसान था जिससे इसकी कीमत और कम हो गई। लेटेक्स कंडोम की शेल्फ लाइफ पांच साल थी, जो कि रबर कंडोम की तुलना में एक बड़ी सुधार थी, जिनकी गुणवत्ता केवल तीन महीने तक ही बनी रहती थी.
आधुनिक कंडोम
आधुनिक कंडोम की तकनीकी लेटेक्स पर ही आधारित है लेकिन इसके रंग, रुप और डिजाइन में क्रांतिकारी परिवर्तन आ गए हैं. आज के कंडोम में ग्राफीन का इस्तेमाल किया जाता है जिससे कंडोम बेहद पतले, मजबूत और लचीलापन लिए होते हैं. इसमें स्किन-ऑन-स्किन जैसा अनुभव मिलता है.इन कंडोम की सतह पर सुपर-हाइड्रोफिलिक नैनोपार्टिकल्स चिपके होते हैं जो चिकनाई को बढ़ा देते हैं. कुछ नए कंडोमों में एसटीडी रोधी दवाएं, सून करने वाले एजेंट, या इरेक्शन को सपोर्ट करने वाली दवा भी कोटिंग की जाती है.
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