Organic Farming Tips: 10वीं कक्षा में पिता को खोने के बाद टेलरिंग से परिवार पालने वाले गया के अनिल कुमार मेहता आज अपनी मेहनत से ‘सब्जी सम्राट’ बन चुके हैं. महज 2 बीघे में जैविक तरीके से विदेशी सब्जियां उगाकर वे सालाना 4 लाख रुपये से अधिक कमा रहे हैं. पढ़िए, कैसे एक छोटे से गांव के किसान ने अपनी आधुनिक तकनीकों और जैविक खेती के दम पर गया से पटना तक सम्मान हासिल किया.
गया: जीवन में जब चुनौतियां आती हैं तो इंसान दो राह चुनता है. या तो टूट जाता है या रिकॉर्ड तोड़ देता है. बिहार के गया जिले के एक छोटे से गांव बरसौना के रहने वाले अनिल कुमार मेहता ने दूसरी राह चुनी. आज वे न केवल एक सफल किसान हैं, बल्कि पूरे गया जिले के लिए प्रगतिशील किसान और जैविक खेती के मास्टर के रूप में एक नई पहचान बन चुके हैं.
संघर्ष की नींव और जिम्मेदारी का बोझ
अनिल कुमार की कहानी करीब 30 साल पहले शुरू हुई थी. जब वे महज दसवीं कक्षा के छात्र थे. उस समय उनके पिता की लंबी बीमारी के कारण मृत्यु हो गई. घर में वे इकलौते बेटे थे. इसलिए पूरे परिवार की जिम्मेदारी अचानक उनके कंधों पर आ गई. छोटी बहनों की शादी और घर का खर्च चलाने के लिए उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी. अपने पिता के पुराने काम यानी टेलरिंग (दर्जी) को संभाल लिया. लेकिन उनके भीतर कुछ बड़ा करने की कसक हमेशा बनी रहती थी. सिलाई मशीन चलाते-चलाते उन्होंने अपने खेतों में भी हाथ आजमाना शुरू किया. जो आगे चलकर उनकी तकदीर बदलने वाला साबित हुआ.
पारंपरिक खेती से हाई-टेक जैविक मॉडल तक
शुरुआत में अनिल भी अन्य किसानों की तरह रासायनिक उर्वरकों का उपयोग करते थे. लेकिन पिछले 10 वर्षों में उन्होंने अपनी खेती का तरीका पूरी तरह बदल दिया है. उन्होंने प्राण संस्था के माध्यम से जैविक खेती के गुर सीखे और खुद जैविक खाद तैयार करना शुरू किया. आज अनिल अपने दो बीघे के खेत में बहुफसली तकनीक का इस्तेमाल करते हैं. उनके खेत की खासियत यह है अलान विधि. इस तकनीक से वे सेम, बीन्स और करेला जैसी लतर वाली सब्जियों का उत्पादन करते हैं. मल्चिंग तकनीक में मिट्टी की नमी बचाने और खरपतवार रोकने के लिए वे मल्चिंग का उपयोग करते हैं. जिस पर मुख्य रूप से रंगीन गोभी और विदेशी सब्जियां उगाई जाती हैं. गया की तपती गर्मी में भी वे लेट्यूस, चाइनीज कैबेज और रंगीन ब्रोकली जैसी विदेशी सब्जियां का सफल उत्पादन कर रहे हैं.
जैविक विधि से उगाई गई उनकी सब्जियों की मांग बाजार में सबसे अधिक रहती है. अनिल बताते हैं कि रासायनिक खाद न डालने के कारण सब्जियों का आकार और स्वाद प्राकृतिक रहता है. जिसके कारण उन्हें आम किसानों की तुलना में बेहतर भाव मिलता है. मात्र दो बीघे की जमीन से वे सालाना 4 लाख रुपये से अधिक का मुनाफा कमा रहे हैं. उनकी सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लौकी, गाजर और करेला जैसी फसलों के लिए उन्हें गया से लेकर पटना तक कई बार राज्य और जिला स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है.
खुद सीख रहे हैं, दूसरों को सिखा भी रहे
अनिल कुमार मेहता अब केवल एक किसान नहीं, बल्कि एक प्रशिक्षक भी हैं. वे जीविका के माध्यम से अन्य किसानों को जैविक खेती की ट्रेनिंग देते हैं. उन्होंने खुद देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर खेती की नई तकनीकों का प्रशिक्षण लिया है. अब उनका लक्ष्य अपने गांव बरसौना को पूरी तरह से जैविक गांव के रूप में विकसित करना है.
सरकारी सहयोग और भविष्य की राह
अनिल अपनी सफलता का श्रेय अपनी कड़ी मेहनत के अलावा कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र और वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन को देते हैं. समय-समय पर सरकार की योजनाओं और सब्सिडी ने उन्हें आगे बढ़ने में मदद की. उनका कहना है कि अगर किसान पारंपरिक रसायनों को छोड़कर जैविक और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाएं, तो खेती कभी भी घाटे का सौदा नहीं होगी. आज अनिल कुमार मेहता उन युवाओं के लिए प्रेरणा हैं जो रोजगार की तलाश में पलायन करते हैं. उन्होंने साबित कर दिया कि यदि मिट्टी से मोह और तकनीक से जुड़ाव हो, तो गांव की पगडंडियों से भी सफलता का रास्ता निकल सकता है.
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मैंने अपने 12 वर्षों के करियर में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम किया है। मेरा सफर स्टार न्यूज से शुरू हुआ और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर डिजिटल और लोकल 18 तक पहुंचा। रिपोर्टिंग से ले…और पढ़ें
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