इक्विटी शेयर, जिन्हें साधारण या कॉमन शेयर भी कहा जाता है, किसी कंपनी में वास्तविक स्वामित्व का अधिकार देते हैं. जब कोई निवेशक इक्विटी शेयर खरीदता है, तो वह कंपनी का आंशिक मालिक बन जाता है. उसे कंपनी की आम बैठकों में वोट देने का अधिकार मिलता है और बड़े फैसलों में भागीदारी का मौका भी. कंपनी को मुनाफा होने पर इक्विटी शेयरधारकों को डिविडेंड मिलता है, लेकिन यह तय नहीं होता.
इक्विटी शेयर में रिटर्न ज्यादा, लेकिन रिस्क भी ज्यादा
डिविडेंड कंपनी के प्रदर्शन और बोर्ड के फैसले पर निर्भर करता है. कंपनी के सभी खर्च और देनदारियां चुकाने के बाद जो लाभ बचता है, उसी में से इक्विटी निवेशकों को हिस्सा मिलता है. यही वजह है कि इक्विटी में रिटर्न की संभावना ज्यादा होती है, लेकिन रिस्क भी ज्यादा रहता है.
प्रेफरेंस शेयर निवेशकों को वोटिंग का अधिकार नहीं
वहीं, प्रेफरेंस शेयर निवेशकों को प्राथमिकता का अधिकार देते हैं. इसका मतलब है कि कंपनी जब डिविडेंड बांटती है तो सबसे पहले प्रेफरेंस शेयरधारकों को भुगतान किया जाता है. इसके अलावा, अगर कंपनी बंद होती है और उसकी संपत्तियां बेची जाती हैं, तो भी उन्हें इक्विटी निवेशकों से पहले भुगतान मिलता है. आमतौर पर प्रेफरेंस शेयर पर डिविडेंड की दर तय होती है, जिससे निवेशकों को अपेक्षाकृत स्टेबल इनकम मिलती है. हालांकि, इन शेयरधारकों को सामान्य परिस्थितियों में वोटिंग का अधिकार नहीं मिलता.
प्रेफरेंस शेयरों में ग्रोथ की संभावना सीमित
दोनों के बीच मुख्य अंतर अधिकार और रिस्क का है. इक्विटी निवेशक ज्यादा रिस्क उठाते हैं, लेकिन लॉन्ग टर्म में बेहतर रिटर्न कमा सकते हैं. प्रेफरेंस शेयर अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाते हैं और निश्चित डिविडेंड देते हैं, लेकिन इनमें ग्रोथ की संभावना सीमित रहती है.
जानिए कौन सा है बेहतर निवेश विकल्प
अगर कोई निवेशक लॉन्ग टर्म में मोटा पैसा कमाना चाहता है और बाजार के उतार-चढ़ाव को सहन कर सकता है, तो इक्विटी शेयर बेहतर ऑप्शन हो सकते हैं. वहीं, जो निवेशक स्टेबल इनकम और कम रिस्क पसंद करते हैं, उनके लिए प्रेफरेंस शेयर उपयुक्त साबित हो सकते हैं. सही चुनाव निवेशक के फाइनेंशियल गोल और रिस्क उठाने की क्षमता पर निर्भर करता है.
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