समीर अरोड़ा अपने निवेश के तरीके को ‘एलिमिनेशन स्ट्रैटेजी’ कहते हैं, जिसे हम ‘छंटाई की रणनीति’ कह सकते हैं. उनका एक मशहूर वाक्य है, “यह जानना ज्यादा आसान है कि कौन हारने वाला है, बजाय इसके कि यह पता लगाना कि विजेता कौन होगा.”
वे सलाह देते हैं कि निवेशकों को बाजार की सबसे कमजोर और नीचे की 150 कंपनियों से तौबा कर लेनी चाहिए. अक्सर लोग भारी नुकसान तब उठाते हैं जब वे ऐसी कंपनियों में पैसा लगा देते हैं जिनका धंधा चौपट हो रहा हो या जिन पर कर्ज का पहाड़ हो. अगर आप पहले ही ऐसी कंपनियों को अपनी लिस्ट से बाहर (रिजेक्ट) कर दें, तो आपका जोखिम बहुत कम हो जाता है. इससे लंबे समय में आपकी कमाई स्थिर रहती है और डूबने का डर नहीं रहता.
घबराने की नहीं, हकीकत समझने की जरूरत
पिछले एक साल में दुनिया की अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले भारत का शेयर बाजार थोड़ा सुस्त रहा. अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव, नए टैक्स (आयात शुल्क) का डर और दुनिया भर में चल रही उथल-पुथल ने निवेशकों के भरोसे को थोड़ा हिलाया. लेकिन समीर अरोड़ा इसे कोई बड़ी तबाही नहीं मानते. उनका कहना है, “भारत के लिए सामान्य स्थिति भी बुरी नहीं है.”
इसका मतलब यह है कि भारतीय कंपनियां लंबे समय से हर साल लगभग 13 से 15 प्रतिशत की दर से अपनी कमाई बढ़ा रही हैं. यह एक बहुत अच्छी रफ्तार है. भले ही किसी एक साल में बहुत बड़ी उछाल न दिखे, लेकिन धीरे-धीरे और लगातार आगे बढ़ना ही भारत की असली मजबूती है.
विदेशी निवेशकों की बिकवाली का असली सच
जब बाजार की कीमतें काफी ऊपर थीं, तब विदेशी निवेशकों ने बड़े पैमाने पर अपने शेयर बेचे. कई लोगों को लगा कि शेयर बहुत महंगे हो गए हैं, इसलिए वे भाग रहे हैं. पर समीर अरोड़ा के मुताबिक वजह सिर्फ कीमत नहीं थी.
उनके अनुसार, दुनिया में चल रहे युद्ध और व्यापारिक नियमों की अनिश्चितता ने विदेशी निवेशकों को सावधान कर दिया. हालांकि, एक दिलचस्प बात यह रही कि वही निवेशक नई टेक्नोलॉजी वाली कंपनियों के आईपीओ (IPO) में जमकर पैसा लगा रहे थे. इससे पता चलता है कि वे भारत से पूरी तरह बाहर नहीं गए हैं, बस अपना तरीका बदल रहे हैं. अरोड़ा का मानना है कि विदेशी निवेश बाजार में नकदी बनाए रखने और रुपये को मजबूत रखने के लिए बहुत जरूरी है, और अगर यह रुकता है तो पूरी अर्थव्यवस्था पर इसका दबाव महसूस होता है.
दुनिया भर की बड़ी कंपनियां अब सिर्फ चीन पर निर्भर नहीं रहना चाहतीं और दूसरे विकल्प (जैसे भारत) तलाश रही हैं, जिसे ‘चीन प्लस वन’ कहा जाता है. समीर अरोड़ा का मानना है कि भारत इस मौके का फायदा उठाने में थोड़ा धीमा जरूर रहा है, लेकिन अगर हमारी नीतियां स्थिर रहें, तो हमें बड़ा लाभ मिल सकता है.
विभिन्न क्षेत्रों पर उनकी राय
- आईटी (IT) सेक्टर: वे यहां थोड़े सावधान रहने की सलाह देते हैं. उनका मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पुराने तरीके के कामकाज को बदल सकती है, जिससे आईटी कंपनियों की कमाई पर असर पड़ सकता है.
- ऑटो सेक्टर: गाड़ियों के बाजार में बड़ा बदलाव आ रहा है. कंपनियां पेट्रोल-डीजल छोड़कर बिजली से चलने वाली गाड़ियों (EV) पर भारी पैसा खर्च कर रही हैं. अगर यह निवेश सही से काम नहीं आया, तो कंपनियों को नुकसान हो सकता है.
- सोना (Gold): अनिश्चित समय में उन्होंने सोने को एक सुरक्षा कवच (सुरक्षित निवेश) के रूप में रखने की सलाह दी है.
शोर से दूर, समझदारी से निवेश
समीर अरोड़ा का सबसे बड़ा संदेश यही है कि बाजार की अफवाहों या बेवजह के डर में न आएं. किसी कंपनी के बारे में चल रही बड़ी-बड़ी कहानियों के बजाय उसकी असली कमाई और उसकी साख पर ध्यान दें.
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि शेयर बाजार की रेस में वह नहीं जीतता जो सबसे तेज भागता है, बल्कि वह जीतता है जो गड्ढों को पहचान लेता है और उनमें गिरने से बच जाता है. गलत और कमजोर शेयरों को अपनी लिस्ट से बाहर रखना ही सफलता का सबसे सरल रास्ता है.
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