Stock Market Today- शेयर बाजार में आज बीएसई, एंजल वन ग्रो जैसी कंपनियों के शेयरों में जोरदार गिरावट आई है. आरबीआई के नए नियमों से डरे निवेशक इन शेयरों को धड़ाधड़ बेच रहे हैं. नए नियमों का क्या होगा असर, जानिए…
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इन सख्त नियमों से ब्रोकर्स की फंडिंग लागत बढ़ेगी.
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इन सख्त नियमों से ब्रोकर्स की फंडिंग लागत बढ़ेगी. लिस्टेड ब्रोकरेज में एंजेल वन का मार्जिन ट्रेडिंग पोर्टफोलियो (MTF) काफी बड़ा है. अब इसे अपनी फंडिंग रणनीति पर दोबारा विचार करना होगा. ग्रो का MTF बुक तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन अब नए नियमों के कारण उसे विस्तार के लिए भारी पूंजी जुटानी पड़ सकती है. JM फाइनेंशियल और सिटी का मानना है कि इससे बाजार में लिक्विडिटी (तरलता) कम हो सकती है और ट्रेडिंग गतिविधियों में सुस्ती आ सकती है.
क्या हैं RBI के नए निर्देश?
RBI ने “कमर्शियल बैंक – क्रेडिट फैसिलिटीज अमेंडमेंट डायरेक्शंस, 2026” जारी किए हैं. नए नियम 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी होंगे. इन नियमों का उद्देश्य बैंकिंग प्रणाली को शेयर बाजार की अस्थिरता से सुरक्षित रखना है. नए नियमों के अनुसार, अब बैंक स्टॉक ब्रोकर्स या अन्य मध्यस्थों (Intermediaries) को केवल ‘पूरी तरह से सुरक्षित’ (Fully Secured) आधार पर ही ऋण दे सकेंगे. पहले की तरह आंशिक गारंटी या केवल प्रमोटर की गारंटी के आधार पर फंड जुटाना अब मुमकिन नहीं होगा.
यदि बैंक किसी एक्सचेंज या क्लियरिंग हाउस के लिए गारंटी जारी करते हैं, तो उस पर कम से कम 50% कोलैटरल होना अनिवार्य है. इसमें भी पेंच यह है कि इस कोलैटरल का 25% हिस्सा नकद (Cash) के रूप में होना चाहिए. यदि कोई ब्रोकर कोलैटरल के रूप में इक्विटी शेयर गिरवी रखता है, तो बैंक उसकी वैल्यू पर 40% का हेयरकट लगाएंगे. यानी 100 रुपये के शेयर पर केवल 60 रुपये तक की ही लिक्विडिटी मिल पाएगी.
प्रोप्राइटरी ट्रेडिंग पर ताला
नए नियमों का सबसे कड़ा प्रहार प्रोप्राइटरी ट्रेडिंग (Proprietary Trading) पर हुआ है. RBI ने स्पष्ट कर दिया है कि बैंक अब ब्रोकर्स की अपनी (प्रोप्राइटरी) ट्रेडिंग को फंड नहीं कर सकते. हालांकि, मार्केट मेकिंग और डेट सिक्योरिटीज की वेयरहाउसिंग के लिए फंडिंग जारी रह सकती है. प्रोप्राइटरी ट्रेडिंग, जिसमें ब्रोकर्स अपने स्वयं के फंड से ट्रेड करते हैं, कुल F&O (वायदा एवं विकल्प) वॉल्यूम का लगभग 40% हिस्सा कवर करती है. अब इन ब्रोकर्स को बैंक गारंटी के लिए 100% कोलैटरल देना होगा, जिससे उनकी परिचालन लागत (Operating Cost) में भारी इजाफा होगा. अच्छी बात यह है कि क्लाइंट ट्रेड्स के लिए जारी बैंक गारंटी पर इस नए नियम का कोई असर नहीं पड़ेगा.
F&O सेगमेंट और इंट्राडे वॉल्यूम पर होगा असर
HDFC सिक्योरिटीज के एमडी और सीईओ धीरज रेल्ली के अनुसार, क्लाइंट ट्रेड्स के लिए जारी बैंक गारंटी पर तो असर नहीं पड़ेगा, लेकिन प्रोप्राइटरी ब्रोकर्स के लिए चुनौतियां बढ़ेंगी. प्रोप्राइटरी ट्रेडिंग करने वाले ब्रोकर्स अब तक बैंक गारंटी के भरोसे बड़ा वॉल्यूम जेनरेट करते थे, लेकिन अब नकद कोलैटरल की अनिवार्यता उनके मार्जिन को खा जाएगी. इससे इंट्राडे लिमिट्स पर दबाव आएगा और ट्रेडिंग वॉल्यूम में गिरावट की संभावना है.
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