पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का इतिहास नया नहीं है। 1960 और 70 के दशक में नक्सल आंदोलन के दौरान हिंसा का जो दौर शुरू हुआ था, उसने राज्य की राजनीतिक संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया। इसके बाद वामपंथी शासन के लंबे कालखंड में भी राजनीतिक विरोधियों के प्रति असहिष्णुता और हिंसा की घटनाएं समय-समय पर सामने आती रहीं। सत्ता परिवर्तन के बाद तूणमूल कांग्रेस एवं ममता बनर्जी के शासन में यह प्रवृत्ति समाप्त नहीं हुई, बल्कि नए स्वरूप में सामने आई। यह स्पष्ट संकेत है कि समस्या केवल किसी एक दल या विचारधारा की नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र में व्याप्त एक गहरे संकट की है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, चुनावों के निकट आते ही जिस प्रकार की घटनाएं सामने आ रही हैं, वे लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरे का संकेत देती हैं। मतदाता सूची के पुनरीक्षण जैसे संवेदनशील कार्य में लगे अधिकारियों को बंधक बनाना यह दर्शाता है कि कुछ तत्व चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि मतदाता की स्वतंत्रता और निष्पक्ष चुनाव के अधिकार पर सीधा हमला है।
इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता उल्लेखनीय है। समय-समय पर न्यायालय ने राज्य सरकार को कड़े निर्देश दिए हैं और कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी की याद दिलाई है। किंतु यह भी एक चिंताजनक तथ्य है कि इन निर्देशों का जमीनी स्तर पर अपेक्षित प्रभाव नहीं दिखाई देता। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या राज्य प्रशासन एवं सत्तारूढ पार्टी इन निर्देशों को लागू करने में अक्षम है या इच्छुक नहीं है? यदि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश भी प्रभावी नहीं हो पा रहे हैं, तो यह लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है। चुनाव के समय बढ़ती अराजकता के पीछे राजनीतिक बौखलाहट भी एक महत्वपूर्ण कारण हो सकती है। जब किसी दल को अपनी लोकप्रियता में गिरावट का भय होता है, तो वह अक्सर लोकतांत्रिक मर्यादाओं को दरकिनार कर असंवैधानिक उपायों का सहारा लेने लगता है। पश्चिम बंगाल में भी कुछ ऐसी ही प्रवृत्तियां देखने को मिल रही हैं, जहां सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ताओं पर विपक्ष को डराने, प्रशासनिक कार्यों में बाधा डालने और चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने के आरोप लगते रहे हैं। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है और लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
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नागरिक समाज सक्रिय रूप से लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए आगे नहीं आएगा, तब तक केवल प्रशासनिक उपायों से इस समस्या का समाधान संभव नहीं है। लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह एक सतत प्रक्रिया है जिसमें कानून का शासन, संस्थाओं की स्वतंत्रता और नागरिकों की भागीदारी महत्वपूर्ण होती है। पश्चिम बंगाल की वर्तमान स्थिति इन सभी पहलुओं पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है। यदि चुनाव प्रक्रिया ही निष्पक्ष और शांतिपूर्ण नहीं रह जाती, तो लोकतंत्र का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति मतदाता का विश्वास होता है, और यदि मतदाता को यह लगने लगे कि मतदाता सूची, चुनाव प्रक्रिया या प्रशासन किसी राजनीतिक दबाव में काम कर रहा है, तो लोकतंत्र की विश्वसनीयता स्वतः कमजोर होने लगती है। इस पूरे घटनाक्रम में प्रशासनिक नाकामी का प्रश्न भी गंभीरता से सामने आता है। किसी भी राज्य में यदि अधिकारी सुरक्षित नहीं हैं, न्यायिक अधिकारी तक बंधक बना लिए जाते हैं और पुलिस या प्रशासन समय पर प्रभावी कार्रवाई नहीं कर पाता, तो यह प्रशासनिक तंत्र की कमजोरी का स्पष्ट प्रमाण है। प्रशासन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी कानून व्यवस्था बनाए रखना और सरकारी कार्यों को निर्भय वातावरण में संपन्न कराना होता है। यदि प्रशासन यह सुनिश्चित नहीं कर पा रहा है, तो इससे जनता में भय और अविश्वास दोनों बढ़ते हैं। जनता का विश्वास ही किसी सरकार की सबसे बड़ी पूंजी होता है, और जब यही विश्वास डगमगाने लगता है, तो शासन की वैधता पर भी प्रश्नचिह्न लगने लगते हैं।
राजनीतिक दलों की भूमिका भी इस पूरे परिदृश्य में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। लोकतंत्र में राजनीतिक दल केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं होते, बल्कि वे लोकतांत्रिक मूल्यों के संवाहक भी होते हैं। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे अपने कार्यकर्ताओं को संयम, कानून के सम्मान और लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करने के लिए प्रेरित करें। लेकिन जब राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कटु संघर्ष में बदल जाती है और कार्यकर्ताओं को किसी भी तरह से राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, तो अराजकता की स्थिति उत्पन्न होती है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि राजनीतिक दल चुनाव को युद्ध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक उत्सव के रूप में देखें। आज आवश्यकता इस बात की है कि पश्चिम बंगाल की घटनाओं को केवल एक राज्य की समस्या न मानकर लोकतंत्र के लिए चेतावनी के रूप में देखा जाए। यदि प्रशासनिक तंत्र कमजोर होगा, राजनीतिक दल मर्यादा नहीं रखेंगे, और जनता का विश्वास कम होता जाएगा, तो लोकतंत्र केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा। लोकतंत्र की रक्षा केवल संविधान या न्यायालय नहीं कर सकते, इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक निष्पक्षता और जनता की जागरूकताकृतीनों का संतुलन आवश्यक है। पश्चिम बंगाल की वर्तमान परिस्थितियां हमें यही संदेश देती हैं कि लोकतंत्र को केवल चुनाव से नहीं, बल्कि व्यवस्था की निष्पक्षता, कानून के शासन और नागरिक विश्वास से मजबूत बनाया जा सकता है।
इस परिप्रेक्ष्य में आवश्यक है कि राज्य सरकार, चुनाव आयोग और न्यायपालिका मिलकर ठोस कदम उठाएं। कानून व्यवस्था को सख्ती से लागू किया जाए, दोषियों के खिलाफ त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई हो और प्रशासनिक तंत्र को राजनीतिक दबाव से मुक्त रखा जाए। इसके साथ ही राजनीतिक दलों को भी आत्ममंथन करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके कार्यकर्ता लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करें। निश्चित ही यह समझना होगा कि लोकतंत्र की रक्षा केवल संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। पश्चिम बंगाल की वर्तमान स्थिति एक चेतावनी है कि यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो यह अराजकता और गहराई तक फैल सकती है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है कि हम सभी मिलकर कानून, नैतिकता और सहिष्णुता के मूल्यों को पुनः स्थापित करें। पश्चिम बंगाल आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां से वह या तो लोकतांत्रिक पुनर्जागरण की ओर बढ़ सकता है या अराजकता के गहरे गर्त में गिर सकता है। यह निर्णय न केवल राजनीतिक नेतृत्व, बल्कि पूरे समाज को मिलकर लेना होगा।
– ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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