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पश्चिम चंपारण का बनहौरा इलाका ‘सीख कबाब’ के गढ़ के रूप में उभरा है. यहां की दर्जनों दुकानों पर मिलने वाला पारंपरिक जायका इतना प्रसिद्ध है कि उत्तर प्रदेश और पड़ोसी देश नेपाल से भी लोग यहां खिंचे चले आते हैं. हांडी मटन के बाद अब यह क्षेत्र नॉन-वेज प्रेमियों की पहली पसंद बन गया है.
बिहार का चंपारण रेंज अपने नॉन वेज जायके के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है. हांडी मटन, और सिख कबाब जैसी कुछ खास रेसिपीज़ हैं, जिन्हें अपने अनोखे टेस्ट के लिए दुनियाभर में पहचान मिली है.

बताया जाता है कि चम्पारण क्षेत्र के हर एक कदम पर आपको नॉन वेज की दर्जनों दुकानें मिल जाएंगी, लेकिन आज हम आपको इस क्षेत्र के एक ऐसे इलाके के बारे में बता रहे हैं. जिसे कबाब के लिए बिहार और उत्तर प्रदेश सहित पड़ोसी देश नेपाल तक पहचान मिली है.

बताते चलें कि यह खास जगह पश्चिम चम्पारण ज़िले के नौतन प्रखंड अंतर्गत आने वाला बनहौरा है. बनहौरा को सीख कबाब के लिए बहुत प्रसिद्धि मिली है. इस क्षेत्र में एक लाइन से सीख कबाब की दर्जनों दुकानें हैं, जहां प्रतिदिन सैकड़ों लोग सिर्फ कबाब का स्वाद लेने आते हैं.
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बनहौरा में सीख कबाब की दुकान चलाने वाले अनिल गुप्ता बताते हैं कि एक किलो कबाब की कीमत करीब 800 रुपए है. ग्राहक खुद खड़े होकर अपनी इच्छा अनुसार बकरे का मांस खरीदते हैं और फिर उसे कबाब बनाने के लिए हमें देते हैं. यहां कबाब की कई दुकानें ऐसी भी हैं जहां बकरे का मांस भी बिकता है.

मटन की खरीदारी के बाद कबाब के लिए क़रीब एक घंटे तक इंतजार करना पड़ता है. इस दौरान दुकानदार उसे ग्राहक के सामने ही पकाते हैं. खाते वक्त ग्राहक को इस बात की पूरी संतुष्टि मिलती है कि उन्हें ताजी और फ्रेश मटन वाली डिश खाने को मिल रही है.

बकौल अनिल, कबाब के स्वाद के लिए यहां हर दिन गोपालगंज, मुजफ्फर और सिवान सहित उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों से तो ग्राहक आते ही हैं. साथ ही नेपाल के लोगों का भी आना जाना लगा रहता है. मजे की बात यह है कि 800 रुपये प्रति किलो की भाव होने के बाजूद भी हर दिन प्रत्येक दुकान से मिनिमम 40 से 45 किलो तक सिख कबाब की बिक्री हो जाती है.
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