मिथिला का पारंपरिक व्यंजन ‘तरुआ’ आज क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है, लेकिन इसकी जड़ें अभाव के दौर से जुड़ी हैं. बुजुर्गों के अनुसार, कभी आर्थिक तंगी के समय बाग-बगीचों में मिलने वाले फूलों और पत्तियों से तरुआ बनाकर अतिथियों का सत्कार किया जाता था. समय के साथ यही साधारण व्यंजन परंपरा, स्वाद और गौरव का प्रतीक बन गया और अब तिलकोर, खम्महाउर व अन्य फूल-पत्तियों का तरुआ मिथिलांचल की खास पहचान माना जाता है.
मिथिलांचल में अतिथि सत्कार की परंपरा सदियों पुरानी है. आर्थिक तंगी के दौर में भी यहां के लोग मेहमानों का स्वागत पूरे सम्मान के साथ करते थे. उस समय संसाधनों की कमी के कारण आसपास के बाग-बगीचों में उपलब्ध फूलों और पत्तियों से तरुआ बनाकर परोसा जाता था. बुजुर्ग महिलाओं के अनुसार, उन्होंने अपनी सास और माताओं से यह परंपरा सीखी और अब नई पीढ़ी को इसके बारे में बता रही हैं.
अब बन चुका है सांस्कृतिक प्रतीक
समय के साथ परिस्थितियां बदलीं, लेकिन यह व्यंजन परंपरा का हिस्सा बन गया. आज तिलकोर, खम्महाउर और अन्य फूल-पत्तियों का तरुआ केवल जरूरत का भोजन नहीं, बल्कि मिथिला की पहचान है. त्योहारों, पारिवारिक आयोजनों और विशेष अवसरों पर इसे खास तौर पर बनाया जाता है.
स्वाद के साथ सेहत भी
स्थानीय लोगों का मानना है कि ये पारंपरिक तरुआ न केवल स्वादिष्ट होते हैं, बल्कि कई फूल और पत्तियां औषधीय गुणों से भरपूर भी होती हैं. यही कारण है कि अब लोग इसे सिर्फ परंपरा निभाने के लिए ही नहीं, बल्कि स्वाद और स्वास्थ्य दोनों के लिए पसंद करते हैं. कुल मिलाकर, जो व्यंजन कभी मजबूरी में बनता था, वही आज मिथिला की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बन चुका है.
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