चूंकि बीएनपी पहले से सत्ता में रहती आई है, इसलिए उसकी जीत के वैश्विक मायने भी हैं। वह यह कि पार्टी कमोबेश पूर्व प्रधानमंत्री स्व.बेगम खालिदा जिया के अधूरे सपनों को ही साकार करेगी। वो भी तब जब उनके पुत्र तारिक रहमान देश के नए प्रधानमंत्री बनेंगे। देखा जाए तो बीएनपी ने जमात-ए-इस्लामी को काफी पीछे छोड़ते हुए प्रचंड जीत दर्ज की है, जहां जमात को महज 42-68 सीटें ही मिलीं हैं। इसप्रकार तारिक रहमान, जो कि बीएनपी के प्रमुख नेता हैं, देश के संभावित प्रधानमंत्री बन सकते हैं।
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बीएनपी की जीत की वजह यह है कि पार्टी ने गरीबी उन्मूलन, भ्रष्टाचार विरोध और विदेशी निवेश पर जोर दिया है। इससे भारत के लिए सियासी मायने भी साफ हैं। भले ही भारत-बीएनपी संबंध ऐतिहासिक रूप से तनावपूर्ण रहे हैं, खासकर पाकिस्तान और जमात से बीएनपी के पुराने गठजोड़ के कारण। इसलिए उनकी जीत से भारत को सीमा सुरक्षा, पूर्वोत्तर क्षेत्र में अस्थिरता और चरमपंथी समूहों की चिंता बढ़ सकती है, हालांकि बीएनपी समानता-आधारित संबंधों का वादा कर रही है। खासकर हसीना युग के बाद विदेश नीति में बदलाव से व्यापार, जल बंटवारा और कनेक्टिविटी पर असर पड़ सकता है।
वहीं बीएनपी की जीत से दुनिया के लिए भी सियासी मायने साफ हैं। बीएनपी की जीत बांग्लादेश में राजनीतिक स्थिरता ला सकती है, लेकिन विदेश नीति में संतुलन अपनाने से चीन और पाकिस्तान के साथ संबंध मजबूत हो सकते हैं। वहीं दक्षिण एशिया में भू-राजनीतिक बदलाव संभव है, जहां भारत के प्रभाव में कमी और चीन के निवेश ($2.1 बिलियन) बढ़ सकता है। वैश्विक रूप से, यह क्षेत्रीय गठबंधनों को प्रभावित कर सकता है, खासकर म्यांमार शरणार्थी और आर्थिक सुधारों के संदर्भ में।
यह ठीक है कि भारत और बीएनपी के बीच संबंध सुधारने के प्रयास चुनाव से पहले ही शुरू हो चुके हैं, जिसमें एस जयशंकर की तारिक रहमान से “बहुत मैत्रीपूर्ण” चर्चा शामिल है। हालांकि हसीना के भारत में रहने से तनाव बरकरार है, फिर भी दोनों पक्ष सहयोग बढ़ाने को इच्छुक दिख रहे हैं। इसलिए संभावित सुधार के कदम उठाये जा सकते हैं। खासकर राजनयिक संपर्क बढ़ाना, क्योंकि भारत ने बीएनपी नेताओं से मुलाकातें कीं, जैसे प्रणय वर्मा की मीरजा फखरुल से, जहां बीएनपी ने भारत की सुरक्षा हितों का सम्मान करने का आश्वासन दिया।
वहीं, व्यापार और वीजा बहाली के दृष्टिगत यात्रा, व्यापार और वीजा प्रतिबंध हटाने पर फोकस किया जा सकता है, जो हसीना के बाद बाधित हो गए थे। खासकर जल बंटवारा और सीमा मुद्दे हल करना यानी बीएनपी पानी बंटवारे और सीमा हत्याओं (जैसे फेलानी घटना) पर जोर दे रही है। इसलिए कुछ चुनौतियां भी आएंगी, क्योंकि बीएनपी हसीना की प्रत्यर्पण की मांग कर रही है, जिसे भारत शरण दे रहा है, इससे जन-भावना भी प्रभावित हो रही है।
वहीं, जमात-ए-इस्लामी का प्रभाव और पाक-चीन झुकाव भारत की चिंता बढ़ा सकता है। फिर भी भविष्य की संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। चूंकि बीएनपी “समानता-आधारित” पड़ोसी संबंधों का वादा कर रही है, जबकि भारत अल्पसंख्यक सुरक्षा और चरमपंथ विरोध की शर्त रख रहा है। इसलिए विशेषज्ञों के अनुसार, व्यावहारिक आवश्यकताएं रीसेट सुनिश्चित करेंगी, लेकिन ऐतिहासिक अविश्वास दूर करने में समय लगेगा।
यद्यपि तारिक रहमान, जो बीएनपी के प्रमुख नेता हैं, और भारत के प्रति संयमित और तटस्थ रुख अपनाते दिख रहे हैं, जो अतीत के तनावपूर्ण रिश्तों से अलग है। वे समानता-आधारित पड़ोसी संबंधों पर जोर देते हैं, लेकिन शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग रखते हैं। उनका मुख्य स्टैंडपॉइंट्स यह है कि अल्पसंख्यक सुरक्षा और स्थिरता के नजरिए से वो अपने भाषणों में अहिंसा, कानून के राज और हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का वादा किया, जो भारत की चिंताओं को संबोधित करता है।
वहीं, समानता का जोर के मद्देनजर “बराबरी के रिश्ते” चाहते हैं, इसलिए उन्होंने पुरानी असमानताओं (जैसे जल बंटवारा, सीमा हत्याएं) पर बात उठाई, लेकिन टकराव से बचते हैं। हाँ, भारत में शरण लेने वाली हसीना को वापस लाने की मांग, जो सबसे बड़ा विवादास्पद मुद्दा है। हालांकि हालिया संकेत यही है कि ढाका लौटने के बाद उनके संयमित भाषण को खुफिया एजेंसियां “इंडिया-न्यूट्रल” मान रही हैं, जो 2001-06 के भारत-विरोधी दौर से अलग है। लिहाजा भारत के साथ सहयोग संभव, लेकिन पाकिस्तान-चीन झुकाव और जमात प्रभाव चिंता का विषय है। इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि व्यावहारिकता से रिश्ते सुधर सकते हैं।
देखा जाए तो तारिक रहमान के हालिया भाषणों में भारत का सीधा जिक्र बहुत कम या न के बराबर आया है, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से सकारात्मक संकेत दिए गए हैं। वहीं उनके भाषणों की मुख्य शैली में भारत का प्रत्यक्ष उल्लेख न करना समाहित है। खासकर ढाका लौटने (25 दिसंबर 2025) के 17 मिनट के पहले भाषण में भारत का नाम नहीं लिया, लेकिन अल्पसंख्यक सुरक्षा (हिंदू, बौद्ध आदि), अहिंसा और कानून के राज पर जोर दिया—जो भारत की प्रमुख चिंताओं को संबोधित करता है।
वहीं, “बांग्लादेश फर्स्ट” नारा यानी “ना दिल्ली, ना रावलपिंडी, सबसे पहले बांग्लादेश” कहकर तटस्थ विदेश नीति का संकेत दिया, जो पुराने भारत-विरोधी रुख से अलग है। उनके सकारात्मक संदेश साफ हैं। वो ये कि अंग्रेजी में अंतरराष्ट्रीय अपील की, समावेशी बांग्लादेश का खाका पेश किया, जो खुफिया एजेंसियों ने “री-अश्योरेंस सिग्नल” माना। देखा जाए तो उनके ये भाषण बीएनपी की री-ब्रांडिंग का हिस्सा हैं, जहां 2001-06 के भारत-विरोधी दौर से दूरी दिखाई गई। कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह भारत के साथ संबंध सुधारने का रणनीतिक संकेत है, हालांकि हसीना प्रत्यर्पण जैसे मुद्दे लंबित हैं।
– कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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