पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां एक तरफ नए राजनीतिक समीकरण बन रहे हैं तो दूसरी ओर पुराने मुद्दे फिर से उभरकर सामने आ रहे हैं। मुर्शिदाबाद जिले में हो रही चुनावी गतिविधियां खासतौर पर इस बदलाव का सबसे बड़ा संकेत दे रही हैं। यहां भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों के बीच तो कांटे का मुकाबला है ही साथ ही मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने के लिए असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन और हुमांयू कबीर के नेतृत्व वाले जन अधिकार मंच का गठबंधन भी मौजूद है। साथ ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी भी यहां से विधानसभा चुनावों में किस्मत आजमा रहे हैं। आज यहां ओवैसी की रैली हुई और जल्द ही ममता बनर्जी भी यहां हुंकार भरने वाली हैं। ऐसे में चुनावी माहौल बेहद गर्मा गया है।
मुर्शिदाबाद के चुनावी समीकरणों पर नजर डालें तो आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल के दो-तिहाई मुस्लिम आबादी वाले मुर्शिदाबाद जिले में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत नामों का हटाया जाना और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ऐसे मुद्दे हैं जो विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारों का राजनीतिक भविष्य तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। दरअसल एसआईआर के बाद 28 फरवरी को प्रकाशित मतदाता सूची में मुर्शिदाबाद के 55 लाख मतदाताओं में से 11 लाख से अधिक को ‘विचाराधीन’ श्रेणी में रखा गया, जो कुल मतदाताओं का लगभग 20 प्रतिशत है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बड़े पैमाने पर नाम हटने से भले ही तृणमूल कांग्रेस को थोड़ी मुश्किलें आ सकती हैं, लेकिन मतदाता सत्तारुढ़ दल के पक्ष में एकजुट हो सकते हैं।
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इसके अलावा, 2025 से जिले में बार-बार होने वाली सांप्रदायिक हिंसा भी राजनीतिक विमर्श पर हावी है। हम आपको याद दिला दें कि शमशेरगंज में 12 अप्रैल 2025 को 72 वर्षीय हरगोविंद दास और उनके बेटे चंदन (42) की भीड़ द्वारा की गई हत्या ने पूरे इलाके को झकझोर दिया था। वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के विरोध में शुरू हुए प्रदर्शन जांगीपुर, शमशेरगंज, धुलियान और सूती में हिंसक हो गए थे। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रीय राजमार्ग जाम किए, पुलिस वाहनों और कई घरों में आगजनी की। यहां तक कि आग बुझाने से रोकने के लिए पानी की आपूर्ति बाधित करने की भी खबरें सामने आईं।
हिंसा पर काबू पाने के लिए कलकत्ता उच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा, जिसके बाद केंद्रीय बलों की तैनाती, निषेधाज्ञा और अस्थायी रूप से इंटरनेट बंद करने जैसे कदम उठाए गए। करीब 60 प्राथमिकी दर्ज की गईं और लगभग 300 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जबकि सैकड़ों लोग भागीरथी नदी पार कर मालदा जिले में शरण लेने को मजबूर हुए। घटना के लगभग एक साल बाद भी इसके जख्म हरे है। इसके अलावा, जांगीपुर के रघुनाथगंज में इस साल 27 मार्च को राम नवमी शोभा यात्रा के दौरान फिर हिंसा भड़की, जिसमें मुस्लिम समुदाय के स्वामित्व वाली दुकानों और ठेलों को निशाना बनाते हुए आगजनी की गई।
आज हुई ओवैसी की रैली की बात करें तो आपको बता दें कि उन्होंने मुर्शिदाबाद जिले के नवदा इलाके के डबटला मैदान में आयोजित रैली को संबोधित करते हुए जो धुआंधार भाषण दिया उससे पूरे क्षेत्र में एक अलग ही माहौल नजर आया। ओवैसी के साथ मंच पर उनके गठबंधन सहयोगी और जन अधिकार मंच के अध्यक्ष हुमायूं कबीर तथा आदिल हसन भी मौजूद थे। ओवैसी ने अपने भाषण में आरोप लगाया कि सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस और अन्य दलों ने पश्चिम बंगाल में मुसलमानों का इस्तेमाल ‘वोट बैंक’ की तरह किया, लेकिन समुदाय के विकास के लिए कुछ नहीं किया। हुमायूं कबीर के नेतृत्व वाली एजेयूपी के उम्मीदवारों के समर्थन में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए ओवैसी ने यह भी दावा किया कि पिछले 50 वर्षों में मुस्लिम समुदाय ने कांग्रेस, वाममोर्चा और तृणमूल कांग्रेस को वोट दिया, लेकिन उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। उन्होंने कहा, ‘‘पश्चिम बंगाल में मुसलमानों को राजनीतिक निर्णय लेने में अधिक प्रतिनिधित्व दिलाने और उनके वास्तविक विकास के लिए हमने कबीर के साथ हाथ मिलाया है। हम सब मिलकर ममता बनर्जी और उनकी पार्टी को करारा झटका देंगे।’’ ओवैसी ने रैली को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘अब समय आ गया है कि मुस्लिम समुदाय से ऐसे नेताओं को चुना जाए जो आपके आर्थिक विकास को सुनिश्चित कर सकें।’’
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