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आज की तेज रफ्तार जिंदगी में खराब लाइफस्टाइल और अनियमित खानपान के कारण कब्ज एक कॉमन समस्या बन गई है। अगर लंबे समय तक कब्ज बना रहे तो इससे बॉडी फंक्शनिंग और ओवरऑल हेल्थ प्रभावित होती है।
‘एबॉट’ की गट हेल्थ सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, भारत में करीब 22% वयस्कों को कब्ज है। इनमें से 13% लोग गंभीर रूप से प्रभावित हैं।
अक्सर लोग कब्ज से राहत के लिए दवाएं लेते हैं। जबकि नेचुरल लैक्सेटिव कब्ज से राहत दिला सकते हैं। ये ऐसे फूड या सब्सटेंस होते हैं, जिससे बाउल मूवमेंट सुधरता है। इससे स्टूल सॉफ्ट हो जाता है और कब्ज की समस्या नहीं होती है।
इसलिए आज जरूरत की खबर में जानेंगे कि-
- नेचुरल लैक्सेटिव क्या होते हैं?
- ये शरीर में कैसे काम करते हैं?
- किन फूड्स में नेचुरल लैक्सेटिव होता है?
एक्सपर्ट: डॉ. नृपेन साइकिया, सीनियर कंसल्टेंट, गैस्ट्रोलॉजी, पीएसआरआई हॉस्पिटल, दिल्ली
सवाल- लैक्सेटिव क्या होते हैं?
जवाब- लैक्सेटिव यानी ऐसी दवाएं या खाने की चीजें, जो कब्ज में राहत देकर पेट साफ करने में मदद करती हैं। लैक्सेटिव अलग-अलग तरीके से काम करते हैं। आमतौर पर डॉक्टर पेट साफ न होने पर लैक्सेटिव्स देते हैं।
सवाल- नेचुरल लैक्सेटिव क्या होते हैं?
जवाब- नेचुरल लैक्सेटिव यानी ऐसी नेचुरल चीजें जो पेट साफ करने में मदद करती हैं। इसमें फाइबर से भरपूर फल, सब्जियां, होल ग्रेन्स शामिल हैं। आर्टिफिशियल लैक्सेटिव की तरह इनमें केमिकल नहीं होता है। ये आमतौर पर रोजमर्रा के खाने का ही हिस्सा होते हैं और धीरे-धीरे, नेचुरल तरीके से कब्ज में राहत देते हैं।
सवाल- नेचुरल लैक्सेटिव शरीर में कैसे काम करते हैं?
जवाब- नेचुरल लैक्सेटिव शरीर में दो तरह से काम करते हैं।
- इनमें मौजूद फाइबर और पानी स्टूल (मल) को मुलायम बनाते हैं, जिससे ये आसानी से पास हो सकें।
- कुछ नेचुरल ऑप्शन आंतों की हल्की मूवमेंट बढ़ाकर बॉवेल को नियमित रखते हैं।
सवाल- कौन से फूड्स नेचुरल लैक्सेटिव होते हैं?
जवाब- नेचुरल लैक्सेटिव वो फाइबर रिच फूड होते हैं, जो पेट को साफ रखने में मदद करते हैं। ग्राफिक में नेचुरल लैक्सेटिव की लिस्ट देखिए-

इन्हें थोड़ा विस्तार से समझते हैं-
फल
कुछ फल नेचुरल लैक्सेटिव की तरह काम करते हैं। पपीता, अमरूद, सेब (छिलके सहित), नाशपाती, केला (पका हुआ), संतरा, मौसंबी, अंगूर, कीवी और अनार जैसे फल फाइबर से भरपूर होते हैं।
फाइबर स्टूल का वॉल्यूम बढ़ाता है और उसे सॉफ्ट बनाता है, जिससे बाउल मूवमेंट आसान हो जाती है। इसके अलावा इन फलों में पानी की मात्रा अधिक होती है, जो बॉडी को हाइड्रेट रखती है और कब्ज की समस्या कम करती है।
अंजीर (ताजा/सूखा)
अंजीर में हाई फाइबर होता है, खासकर इसके छोटे-छोटे बीज आंतों को स्टिमुलेट करते हैं। यह स्टूल को सॉफ्ट बनाता है और आसानी से बाहर निकालने में मदद करता है। इसलिए इसे पहले के समय में कब्ज के घरेलू उपाय के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है।
प्रून्स (सूखा आलूबुखारा)
प्रून्स में एक नेचुरल तत्व ‘सॉर्बिटोल’ होता है। इससे आंतों में पानी एब्जॉर्ब होता है, जिससे स्टूल सॉफ्ट हो जाता है और बाउल मूवमेंट बेहतर हो जाता है। इससे कब्ज में राहत मिलती है।
अलसी के बीज
अलसी के बीज फाइबर से भरपूर होते हैं। ये आंतों में जेल जैसा टेक्सचर बनाते हैं, जिससे स्टूल स्मूदली पास होता है और बाउल मूवमेंट रेगुलर रहता है।
कॉफी
कॉफी में मौजूद कैफीन आंतों की मसल्स को स्टिमुलेट करता है। यह कोलन (बड़ी आंत) की एक्टिविटी बढ़ाकर बाउल मूवमेंट को ट्रिगर कर सकता है। इसलिए कई लोगों को कॉफी पीने के बाद तुरंत टॉयलेट जाने की इच्छा होती है।
नींबू
नींबू का रस डाइजेशन में मदद करता है। यह गैस्ट्रिक जूस के प्रोडक्शन को बढ़ाता है। गुनगुने पानी के साथ लेने पर बाउल मूवमेंट में मदद करता है।
सवाल- कब्ज से बचने के नेचुरल उपाय क्या हैं?
जवाब- इसके लिए कुछ तरीके अपनाए जा सकते हैं। ग्राफिक में देखिए-

सवाल- क्या नेचुरल लैक्सेटिव के साइड इफेक्ट्स भी हो सकते हैं?
जवाब- हां, गलत तरीके या ज्यादा मात्रा में नेचुरल लैक्सेटिव लेने पर नुकसान हो सकता है। जैसे बहुत ज्यादा कॉफी पीने से कैफीन टॉक्सिसिटी हो सकती है। ग्राफिक में इसके सभी साइड इफेक्ट्स देखिए-

थोड़ा विस्तार से समझते हैं-
1. गैस, ब्लोटिंग इसबगोल, चिया सीड्स या ओट्स जैसे नेचुरल लैक्सेटिव्स ज्यादा लेने पर गैस हो सकती है।
2. पेट में ऐंठन या दर्द कुछ नेचुरल लैक्सेटिव्स जैसे प्रून्स या अंजीर ज्यादा मात्रा में नहीं लेने चाहिए। इससे बाउल मूवमेंट बहुत बढ़ जाता है, जिसके कारण क्रैम्प्स हो सकते हैं।
3. डायरिया नेचुरल लैक्सेटिव्स ज्यादा लेने से स्टूल ढीला हो सकता है, लेकिन इससे कब्ज ठीक होने की बजाय डायरिया हो सकता है।
4. डिहाइड्रेशन लैक्सेटिव्स पानी को एब्जॉर्व करते हैं। इसलिए इनके साथ लगातार ढेर सारा पानी पीना जरूरी है। पानी कम पीने पर डिहाइड्रेन हो सकता है।
5. इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन ज्यादा मात्रा में नेचुरल लैक्सेटिव्स लेने पर शरीर में सोडियम-पोटेशियम का बैलेंस बिगड़ सकता है।
6. दवाओं का असर कम हो सकता है इसबगोल या हाई फाइबर नेचुरल लैक्सेटिव्स से कुछ दवाओं के एब्जॉर्प्शन पर असर पड़ता है।
7. एलर्जी कुछ लोगों को नेचुरल लैक्सेटिव फूड से एलर्जी हो सकती है।
सवाल- क्या नेचुरल या ओवर-द-काउंटर लिए गए लैक्सेटिव्स पर परमानेंट निर्भरता भी हो सकती है?
जवाब- हां, दोनों तरह के लैक्सेटिव्स डिपेंडेंसी पैदा कर सकते हैं। लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि डिपेंडेंसी का जोखिम हमेशा और सबके लिए एक जैसा नहीं होता। डिपेंडेंसी के कुछ कारण हैं-
- अगर हफ्तों-महीनों तक रोज लैक्सेटिव्स लिए जाएं।
- अगर बिना डॉक्टर की सलाह के अपने मन से लैक्सेटिव्स लिए जाएं।
- अगर इंस्टेंट रिलीफ पर फोकस हो, लेकिन लाइफस्टाइल में सुधार न किए जाएं।
- अगर IBS या थायरॉइड जैसी कोई मेडिकल कंडीशन हो।
- अगर ओवर-द-काउंटर मिलने वाले स्टिमुलेंट लैक्सेटिव का यूज ज्यादा किया जाए।
- अगर टॉयलेट जाने का टाइमिंग और रूटीन खराब हो।
कुल मिलाकर, नेचुरल लैक्सेटिव रोजमर्रा की डाइट के ऐसे विकल्प हैं, जो पेट को हल्का रखने और पाचन को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। हालांकि ये ज्यादातर सुरक्षित होते हैं, पर हर शरीर का रिस्पॉन्स अलग होता है। इसलिए इन्हें संतुलित मात्रा में लें और अपनी लाइफस्टाइल को भी साथ में बैलेंस रखना जरूरी है। अगर अक्सर कब्ज की समस्या बनी रहती है तो इसे नजरअंदाज न करें।
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