लेकिन कांग्रेस इस पूरी कवायद को लेकर बेहद आक्रामक रुख में है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने साफ शब्दों में कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में सर्वदलीय बैठक बुलाए बिना इस कानून के क्रियान्वयन पर कोई भी चर्चा अधूरी और संदिग्ध मानी जाएगी। खरगे ने यह भी सवाल उठाया है कि जब संसद ने लगभग ढाई साल पहले इस ऐतिहासिक कानून को सर्वसम्मति से पारित कर दिया था, तो अब अचानक इसके क्रियान्वयन के तौर तरीकों पर चर्चा की जरूरत क्यों पड़ रही है?
हम आपको बता दें कि सरकार की ओर से संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष को साथ लाने की कोशिश जरूर की, लेकिन यह पहल फिलहाल बेअसर साबित होती दिख रही है। सूत्रों के मुताबिक, सरकार इस कानून में संशोधन कर सकती है, ताकि इसे तुरंत लागू किया जा सके। इसके तहत सबसे अहम प्रस्ताव सीटों के घुमाव का है, यानी हर चुनाव में अलग अलग सीटों को महिलाओं के लिए आरक्षित किया जाएगा।
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गीता मुखर्जी समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार यह फार्मूला राजनीतिक रूप से संतुलन बनाने की कोशिश जरूर है, लेकिन इसके अपने विवाद भी हैं। अगर हर चुनाव में सीटें बदलेंगी, तो कई नेताओं के राजनीतिक भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडराएंगे। यही वजह है कि कई दल इस प्रस्ताव को लेकर भी पूरी तरह सहज नहीं हैं।
सबसे बड़ा कानूनी पेच भी यहीं है। मौजूदा कानून के अनुसार महिला आरक्षण लागू करने से पहले जनगणना और परिसीमन अनिवार्य है। इसे बदलने के लिए संविधान संशोधन करना होगा, जिसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत जरूरी है। यहां सरकार की असली चुनौती सामने आती है, क्योंकि उसके पास अकेले इतना बहुमत नहीं है।
लोकसभा में भाजपा के पास 240 सदस्य हैं, जबकि राज्यसभा में संख्या 103 के आसपास है। ऐसे में बिना विपक्ष के समर्थन के यह संशोधन पारित कर पाना लगभग असंभव है। यही वजह है कि सरकार विपक्ष को साथ लाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है, लेकिन कांग्रेस की शर्तें इस राह को कठिन बना रही हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पूरा विवाद केवल महिला आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे आने वाले चुनावों की रणनीति भी छिपी है। एक तरफ सरकार महिला सशक्तिकरण के बड़े एजेंडे को तेजी से लागू कर राजनीतिक लाभ लेना चाहती है, वहीं विपक्ष इसे चुनावी चाल बताकर घेरने में जुटा है।
इस बीच देश की महिलाओं की निगाहें इस पूरे घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं। वर्षों से लंबित इस कानून के लागू होने की उम्मीद बार बार जगी और टूटी है। अब जब फिर से उम्मीद की किरण दिखाई दे रही है, तो सियासी टकराव इसे फिर से अधर में लटका सकता है।
स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद से लेकर सड़कों तक जोरदार बहस का केंद्र बनेगा। अगर सरकार और विपक्ष के बीच सहमति नहीं बनती, तो महिला आरक्षण का सपना एक बार फिर लंबी प्रतीक्षा में बदल सकता है। लेकिन अगर कोई ठोस निर्णय निकलता है, तो यह भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित होगा।
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