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Project Kusha: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत एक साथ चार मोर्चों पर काम शुरू कर दिया है. लैंड, एयर और मैरीटाइम सिक्योरिटी पर फोकस किया जा रहा है. इसके साथ ही एरियल थ्रेट से निपटने के लिए स्वदेशी तकनीक पर आधारित एयर डिफेंस सिस्टम भी डेवलप किया जा रहा है. इसे ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ का नाम दिया गया है, ताकि देशभर के स्ट्रैटजिक ठिकानों को किसी भी तरह के खतरे से सुरक्षित रखा जा सके. सुदर्शन चक्र को साल 2035 तक पूरी तरह से डेवलप करने का लक्ष्य रखा गया है.
Project Kusha: प्रोजेक्ट कुश के तहत थ्री-टायर एयर डिफेंस सिस्टम डेवलप किया जा रहा है जो 60 किलोमीटर से लेकर 350-400 किलोमीटर तक के एयरस्पेस को अभेद्य किला बना देगा. (फाइल फोटो/PTI)
भारत की महत्वाकांक्षी लंबी दूरी की वायु रक्षा परियोजना प्रोजेक्ट कुश अब तेजी से कॉन्सेप्ट से वास्तविकता की ओर बढ़ रही है. Defence Research and Development Organisation (डीआरडीओ) के वरिष्ठ अधिकारियों ने इसके बारे में महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है, जिससे साफ हो गया है कि आने वाले वर्षों में भारतीय वायुसेना को एक अत्याधुनिक, मल्टी-लेयर्ड वायु रक्षा कवच मिलने जा रहा है. डीआरडीओ की डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेटरी (DRDL) के निदेशक ए. राजू ने पुष्टि की है कि प्रोजेक्ट कुश के तहत तीन इंटरसेप्टर मिसाइलें (मार्क-1, मार्क-2 और मार्क-3) विकसित की जा रही हैं. ये तीनों मिलकर 60 किलोमीटर से लेकर 350 किलोमीटर तक की दूरी पर हवाई खतरों को निष्क्रिय करने में सक्षम होंगी. राजू के मुताबिक, प्रोजेक्ट कुश अब डेवलपमेंटल ट्रायल के अहम फेज में प्रवेश कर रही है. पहले टेक्निकल ट्रायल होंगे, इसके बाद Indian Air Force के साथ यूजर ट्रायल किए जाएंगे. सभी परीक्षण सफल होने पर इस प्रणाली को औपचारिक रूप से सेवा में शामिल किया जाएगा.
थ्री-टायर सुरक्षा कवच
प्रोजेक्ट कुश की सबसे बड़ी खासियत इसका लेयर्ड यानी मल्टी-लेवल डिजाइन है. ‘इंडियन डिफेंस रिसर्च विंग’ की रिपोर्ट के अनुसार, मार्क-1 (M1) इंटरसेप्टर की मारक क्षमता लगभग 150 किमी तक होगी. मार्क-2 (M2) करीब 250 किमी तक लक्ष्य को भेद सकेगी, जबकि मार्क-3 (M3) भारत की इंटरसेप्शन क्षमता को लगभग 350 से 400 किलोमीटर तक पहुंचा देगी. हालांकि, पूरा सिस्टम 60 किमी से 350 किमी तक के दायरे में सुरक्षा प्रदान करेगी, जिससे अलग-अलग दूरी और ऊंचाई पर मौजूद लक्ष्यों को निशाना बनाया जा सकेगा. यह प्रणाली उन्नत लड़ाकू विमानों, क्रूज मिसाइलों और अन्य हाई-वैल्यू हवाई खतरों के खिलाफ प्रभावी ढाल के रूप में काम करेगी.
Project Kusha: प्रोजेक्ट कुश नेशनल एयर डिफेंस सिस्टम मिशन सुदर्शन चक्र का ही हिस्सा है, जिसका उद्देश्य एरियल थ्रेट को न्यूट्रालाइज करना है. (फाइल फोटो/PTI)
2030 से तैनाती की संभावना
इंडियन एयरफोर्स इस परियोजना को अपने भविष्य के एयर डिफेंस स्ट्रक्चर का अहम स्तंभ मान रही है. मौजूदा योजनाओं के अनुसार, वायुसेना प्रोजेक्ट कुश की करीब 10 स्क्वाड्रन खरीदने की योजना बना रही है. इसकी चरणबद्ध तैनाती वर्ष 2030 से शुरू होने की उम्मीद है. रणनीतिक दृष्टि से यह परियोजना भारत की आयात निर्भरता कम करने की दिशा में बड़ा कदम है. इससे देश को मिसाइल गाइडेंस, सीकर तकनीक, प्रोपल्शन सिस्टम और नेटवर्क सेंट्रिक कमांड एंड कंट्रोल जैसी उन्नत तकनीकों में आत्मनिर्भरता मिलेगी. प्रोजेक्ट कुश के सेवा में आने के बाद यह मौजूदा प्रणालियों जैसे (Akash और S-400) के साथ मिलकर काम करेगा. जहां आकाश मध्यम दूरी की सुरक्षा प्रदान करता है और S-400 अत्यधिक लंबी दूरी की क्षमता देता है, वहीं कुश इन दोनों के बीच की दूरी को भरते हुए एक मजबूत, लचीला और मल्टी-लेयर एयर सिक्योरिटी नेटवर्क तैयार करेगा.
प्रोजेक्ट कुश क्यों अहम?
प्रोजेक्ट कुश को भारत की अगली पीढ़ी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली के रूप में देखा जा रहा है. इसकी सफलता न केवल भारतीय वायुसेना की हवाई सुरक्षा क्षमता को नई ऊंचाई देगी, बल्कि यह भी साबित करेगी कि भारत जटिल और बहु-स्तरीय वायु रक्षा प्रणालियां स्वदेशी तकनीक से विकसित करने में सक्षम है. आने वाले वर्षों में परीक्षणों की प्रगति और समय पर तैनाती इस परियोजना की दिशा तय करेगी, लेकिन फिलहाल यह स्पष्ट है कि प्रोजेक्ट कुश भारत की रक्षा तैयारियों में एक निर्णायक बदलाव का संकेत दे रहा है.
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बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से प्रारंभिक के साथ उच्च शिक्षा हासिल की. झांसी से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में PG डिप्लोमा किया. Hindustan Times ग्रुप से प्रोफेशनल कॅरियर की शु…और पढ़ें
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