तकनीकी रूप से देखें तो भारतीय सामान पर अब 25 फीसदी के बजाय 15 फीसदी का अस्थायी टैरिफ लगेगा. इसके साथ ही करीब 3 फीसदी तक मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) ड्यूटी चुकानी होगी. यानी कुल 18 फीसदी टैरिफ लगेगा. यह पहले के 25 फीसदी से कम है और भारत-अमेरिका ट्रेड डील में बताए गए 18 फीसदी टैरिफ के बराबर ही है.
ट्रंप ने पुराने टैरिफ अवैध घोषित होते नए टैरिफ घोषित कर दिए.
भारत और अमेरिका के व्यापारिक रिश्तों की हालिया टाइमलाइन पर नजर डालें तो यह काफी उतार-चढ़ाव भरी रही है. 2 अप्रैल 2025 को अमेरिका ने भारत पर 26 फीसदी का रेसिप्रोकल टैरिफ थोप दिया था, जिसे बाद में मामूली रूप से घटाकर 25 फीसदी किया गया. अगस्त में रूस से तेल की खरीद जारी रखने के कारण भारत पर 25 फीसदी की अतिरिक्त पेनल्टी लगा दी गई और कुल टैरिफ का बोझ 50 फीसदी तक पहुंच गया. हालांकि, हाल ही में एक अंतरिम ट्रेड डील के फ्रेमवर्क पर सहमति बनी थी, जिसमें टैरिफ को घटाकर 18 फीसदी करने और पेनल्टी हटाने का प्रस्ताव था. यह समझौता पूरी तरह लागू हो पाता उससे पहले सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया और ट्रंप का उस पर रिएक्शन भी.
भारत पर क्या होगा असर
ट्रंप के इस नए फैसले का भारतीय निर्यात पर मिला-जुला असर देखने को मिल सकता है. तकनीकी रूप से देखें तो भारतीय सामान पर अब 25 फीसदी के बजाय 15 फीसदी का अस्थायी टैरिफ लगेगा. इसके साथ ही करीब 3 फीसदी तक मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) ड्यूटी चुकानी होगी. यानी कुल 18 फीसदी टैरिफ लगेगा. यह पहले के 25 फीसदी से कम है और भारत-अमेरिका ट्रेड डील में बताए गए 18 फीसदी टैरिफ के बराबर ही है. कुल मिलाकर इससे भारत को अस्थाई राहत ही मिलेगी.
हालांकि, यह राहत पूरी तरह स्थायी नहीं है. स्टील, एल्युमिनियम और कॉपर जैसे भारी उद्योगों पर अभी भी 50 फीसदी का भारी शुल्क बरकरार है, और ऑटो कंपोनेंट्स पर भी 25 फीसदी की मार जारी रहेगी. राहत की बात यह है कि अमेरिका ने फार्मा, जरूरी खनिज, ऊर्जा उत्पाद और कुछ कृषि उत्पादों को इस 15 फीसदी सरचार्ज के दायरे से बाहर रखा है, जिससे भारत के प्रमुख निर्यात क्षेत्रों को संजीवनी मिल सकती है.
क्या ट्रेड डील पर होगा असर
भारत और अमेरिका के बीच हुई ट्रेड डील पर ट्रंप के फैसले का असर नहीं होगा. अंतरिम ट्रेड डील में टैरिफ को 18 फीसदी करने का प्रस्ताव है. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के टैरिफ को असंवैधानिक घोषित करने से ट्रंप प्रशासन दबाव मे भी रहेगा और पूर्ण डील में यही बात भारत के पक्ष में जाएगी.
रिफंड पर अनिश्चितता के बादल
इस नीतिगत बदलाव ने अमेरिकी आयातकों और भारतीय निर्यातकों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है, जो रिफंड से जुड़ा है. जिन आयातकों ने पहले ही 25 फीसदी की ऊंची दर पर माल खरीदा है, वे अब उस अतिरिक्त 10 फीसदी राशि की वापसी की उम्मीद कर रहे हैं, जिस पर फिलहाल कोई स्पष्टता नहीं है. इसके अलावा, अमेरिका भविष्य में 1930 के टैरिफ एक्ट या 1974 के ट्रेड एक्ट की कठोर धाराओं का इस्तेमाल कर भारत पर दबाव बना सकता है.
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