घाटे का सौदा, पैसा कहां से लाएंगे
वीना सीकरी ने कहा, बांग्लादेश इस डील के तहत बोइंग जेट्स जैसी महंगी चीजें खरीदने का वादा तो कर रहा है, लेकिन इसके लिए पैसा कहां से आएगा? इसके लिए उन्हें फिर से आईएमएफ से कर्ज लेना पड़ेगा. इस तरह के भारी कर्ज में डूबने से बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था और कमजोर होगी. यानी अमेरिका से महंगा कच्चा माल खरीदना और कर्ज के बदले ट्रेड डील करना बांग्लादेश के लिए भविष्य में घाटे का सौदा साबित हो सकता है.
सवाल- जवाब में समझिए भारत क्यों भारी
कांग्रेस का ‘Zero Access Clause’ पर क्या दावा है?
कांग्रेस का कहना है कि बांग्लादेश अब अमेरिकी कॉटन और फाइबर का इस्तेमाल करेगा ताकि उसे अमेरिकी बाजार में कपड़ों के निर्यात पर 0% टैरिफ देना पड़े, जबकि भारत को 18% टैरिफ देना पड़ता है.
क्या अमेरिका से कपास मंगाना बांग्लादेश के लिए सस्ता है?
बिल्कुल नहीं. 2026 के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिकी कपास की वैश्विक कीमत लगभग 75 से 75 सेंट प्रति पाउंड है. शिपिंग, लॉजिस्टिक्स और अन्य खर्च जोड़कर यह बांग्लादेश को लगभग 14,800 रुपये प्रति क्विंटल पड़ेगी.
भारत में कपास की कीमत क्या है?
भारत में कपास का भाव वर्तमान में 6,200 से 7,800 रुपये प्रति क्विंटल (वैरायटी के आधार पर) के बीच है. यानी अमेरिकी कपास भारत के मुकाबले लगभग दोगुनी महंगी है.
19% टैरिफ छूट और कच्चे माल की कीमत का गणित क्या है?
अगर बांग्लादेश अमेरिका से 100% महंगा कपास खरीदकर 19% टैरिफ बचाता भी है, तो भी उसकी कुल लागत यानी कास्ट ऑफ प्रोडक्शन भारत से खरीदे गए सस्ते कच्चे माल के मुकाबले ज्यादा ही रहेगी. अगर कच्चा माल ही दोगुना महंगा है, तो 19% टैरिफ की बचत भी बांग्लादेशी कपड़े को भारतीय कपड़े से सस्ता नहीं बना पाएगी.
शिपिंग और समय का क्या अंतर है?
भारत से कपास या यार्न ट्रक या ट्रेन के जरिए 3 से 7 दिनों में बांग्लादेश पहुंच जाता है. अमेरिका से समुद्री रास्ते से माल आने में 30 से 45 दिन लगते हैं. लंबी अवधि का मतलब है ज्यादा ब्याज और बड़ी इन्वेंट्री लागत.
अभी बांग्लादेश कितना अमेरिकी कपास खरीदता है?
आंकड़ों के अनुसार, बांग्लादेश अपनी जरूरत का 70% से अधिक हिस्सा भारत से आयात करता है. कुछ ब्राजील से मंगाता है. अमेरिकी कपास की हिस्सेदारी अब भी बहुत सीमित है क्योंकि यह उनके लिए ‘कॉस्ट इफेक्टिव’ नहीं है. अमेरिकी कपास की हिस्सेदारी बहुत कम है क्योंकि वह ‘प्रीमियम’ श्रेणी में आती है और उसकी ढुलाई महंगी पड़ती है.
क्या बांग्लादेश रातों-रात भारत से सप्लाई बंद कर सकता है?
नहीं. बांग्लादेश के टेक्सटाइल हब जैसे गाजीपुर, सावर की मशीनें और सप्लाई चेन भारतीय कॉटन की गुणवत्ता के हिसाब से सेट हैं. अमेरिकी फाइबर के लिए उन्हें अपनी मैन्युफैक्चरिंग लाइन में बड़े बदलाव करने होंगे.
’Zero Access Clause’ की असली शर्त क्या है?
अमेरिका की यह शर्त अक्सर ‘Yarn Forward Rule’ जैसी होती है, जिसका मतलब है कि कपड़े का एक-एक धागा अमेरिका का होना चाहिए. बांग्लादेश जैसे देश के लिए अपनी पूरी सप्लाई चेन को सिर्फ अमेरिकी धागे पर निर्भर करना एक बड़ा जोखिम है.
क्या तिरुपुर- सूरत के भारतीय निर्यातकों को खतरा है?
भारत के पास अपना विशाल कच्चा माल है. बांग्लादेश के पास कपास नहीं है. अगर बांग्लादेश महंगा अमेरिकी कच्चा माल इस्तेमाल करेगा, तो वैश्विक बाजार में उसके कपड़ों की कीमत बढ़ जाएगी, जिससे भारतीय कपड़ों को प्रतिस्पर्धा में फायदा मिल सकता है.
अमेरिकी डील की ‘छिपी हुई’ शर्तें क्या हैं?
अमेरिकी ‘जीरो टैरिफ’ केवल चुनिंदा गारमेंट श्रेणियों पर है, सभी पर नहीं. इसके अलावा, बांग्लादेश को अमेरिका से 15 बिलियन डॉलर की एनर्जी और 3.5 बिलियन डॉलर के कृषि उत्पाद खरीदने की बाध्यता है.
अंततः फायदा किसका होगा?
अगर बांग्लादेश महंगा अमेरिकी कच्चा माल इस्तेमाल करता है, तो उसकी उत्पादन लागत इतनी बढ़ जाएगी कि अमेरिकी बाजार में उसका ‘जीरो टैरिफ’ का फायदा बेअसर हो जाएगा. भारत अपनी कम लागत (Low Cost) के दम पर अब भी टक्कर दे सकता है.
बांग्लादेश की इकोनॉमी पर इस डील का क्या असर होगा?
जैसा कि वीना सीकरी ने कहा, बोइंग विमानों की खरीद और अमेरिका से महंगे आयात के कारण बांग्लादेश का ‘बैलेंस ऑफ पेमेंट’ बिगड़ेगा. विदेशी मुद्रा भंडार की कमी से जूझ रहे देश के लिए भारत से सस्ता माल खरीदना ही एकमात्र व्यावहारिक रास्ता है.
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