पीढ़ियों से चल रहा रंगों का व्यापार
रंग बाजार के व्यापारी अनंत राम गुप्ता ने बताया कि यह बाजार उनके बाप-दादाओं के समय से चला आ रहा है. उनके अनुसार हटिया में उनकी दुकान 100 साल से भी ज्यादा पुरानी है और यहां लंबे समय से रंगों का बड़ा कारोबार होता रहा है. उन्होंने बताया कि पहले हाथ से रंग तैयार होते थे, अब मशीनों और आधुनिक पैकिंग का सहारा लिया जाता है, लेकिन गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जाता. व्यापारियों के मुताबिक यहां तैयार होने वाला गुलाल और अबीर, अरारोट और खाने वाले रंगों से बनाया जाता है. इससे रंग मुलायम रहते हैं और त्वचा को कम नुकसान पहुंचाते हैं. यही वजह है कि हटिया के रंगों की मांग दूर-दराज के राज्यों तक बनी रहती है.
होली से पहले तेज हो जाती है सप्लाई
होली के साथ जुड़ी परंपरा
होली के करीब आते ही हटिया बाजार में ग्राहकों की भीड़ बढ़ जाती है. दुकानों के बाहर लाल, गुलाबी, पीले, हरे और नीले रंगों के बड़े ढेर सज जाते हैं. थोक के साथ-साथ खुदरा ग्राहक भी यहां से खरीदारी करते हैं. बाजार की गलियों में दिनभर चहल-पहल बनी रहती है.व्यापारी अनंत राम गुप्ता का कहना है कि होली का सीजन उनके साल भर के कारोबार का अहम हिस्सा होता है. अच्छी बिक्री से ही कई परिवारों की रोजी-रोटी जुड़ी है. उनका कहना है कि हटिया का रंग बाजार सिर्फ व्यापारिक केंद्र नहीं, बल्कि शहर की पुरानी परंपरा का हिस्सा है.करीब एक सदी से अधिक समय से यह बाजार होली के त्योहार को रंगीन बना रहा है. बदलते समय के साथ कारोबार का तरीका जरूर बदला है, लेकिन हटिया की पहचान आज भी देश के बड़े रंग बाजारों में बनी हुई है.
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