नीति सही हो इरादे मजबूत हो और नियत साफ हो तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको नहीं हरा सकती और यह बात भारत कई मौकों पर साबित कर चुका है। जिसने भी भारत को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की उनको भारत ने भी ऐसा जवाब दिया कि जो इतिहास में दर्ज हो गया। ऐसा ही कुछ अब भारत ने अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप के साथ भी किया है। जो ट्रंप भारत पर भारीभरकम टेरिफ लगाकर यह सोच रहे थे कि वो उनके आगे झुक जाएगा और रूस से रिश्ते तोड़ लेगा। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। बल्कि भारत ने भी मजबूती के साथ ऐसा उल्टा दांव मारा कि टेरिफ से भी कई गुना ज्यादा अमेरिका को नुकसान हो गया। आपको बताऊंगा कि भारत ने बिना किसी युद्ध लड़े कैसे ट्रंप से बड़ी जंग जीत ली।
साथ ही बताऊंगा कि भारत ने ट्रंप से टेरिफ का क्या बदला लिया है कि जिसने पूरे अमेरिका को हिला दिया है और आखिर में बताऊंगा कि भारत ने कैसे अमेरिका को बड़ा झटका देते हुए उसकी अर्थव्यवस्था को करीब ₹4 लाख करोड़ का नुकसान पहुंचा दिया। दरअसल भारत से पंगा लेने वाले ट्रंप यह भूल गए थे कि भारत समय के साथ उन्हें ऐसी पटकनी देगा कि जिसके बारे में उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा। विकसित देश अमेरिकी बॉन्ड और डॉलर को सुरक्षित ठिकाना मानते हैं। अक्टूबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच विकसित देश अमेरिकी सरकारी बॉन्ड्स और डॉलर खरीद रहे हैं। जापान, जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन इनमें पूंजी लगा रहे हैं। वहीं भारत, चीन और ब्राजील जैसे ब्रिक्स देश इनमें दूरी बना रहे हैं। पिछले 1 साल में भारत, चीन और ब्राजील ने अमेरिकी बॉन्ड में निवेश 183 अरब डॉलर घटाया है। भारत के पास अक्टूबर 2025 में 190.7 अरब डॉलर कीमत के अमेरिकी बोंड्स थे। जबकि अक्टूबर 2024 में यह आंकड़ा 241.4 अरब डॉलर का था। यानी कि इसमें 40% की भारी गिरावट आई है।
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ग्लोबल फॉरेक्स रिजर्व में डॉलर की हिस्सेदारी गिरी है। 5 साल में ही इसमें 18% की गिरावट आई है। आंकड़े बता रहे हैं कि भारत का अमेरिका की ट्रेजरी में निवेश तेजी से नीचे आ रहा है। महज एक साल के भीतर ही इसमें 21% की गिरावट दिख रही है। इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्थाओं करीब ₹4.5 लाख करोड़ का नुकसान हुआ है। यह देश की विदेश मुद्रा भंडार की प्रबंधन रणनीति में बदलाव की ओर सीधा इशारा कर रहा है। सरकार ने ग्लोबल इकॉनमी में आ रहे आर्थिक और भू राजनीतिक बदलाव के बीच यह रणनीति अपनाई है।
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इसका मकसद भारतीय अर्थव्यवस्था में मजबूती लाना और ग्लोबल इकॉनमी में आ रहे उतार-चढ़ाव से बचना है। भारत की नीति साफ है कि डॉलर पर निर्भरता घटाकर एक मजबूत संतुलित विदेशी भंडार प्रणाली बनाना है। वृक्ष देश भी इस रणनीति के तहत अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटा रहे हैं।
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