भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा आबादी है। यदि इस ऊर्जा को गणित, भौतिकी, कंप्यूटर विज्ञान और डाटा विज्ञान जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षित किया जाए तो भारत एआई अनुसंधान और नवाचार में विश्व की अग्रिम पंक्ति में खड़ा हो सकता है। विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों की भूमिका यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। हमें ऐसे संस्थानों की आवश्यकता है जो वास्तविक शोध और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दें, न कि केवल झूठे दावों और विज्ञापन के बल पर प्रतिष्ठा अर्जित करने का प्रयास करें। शिक्षा में पारदर्शिता और गुणवत्ता ही उस आधारशिला को मजबूत करेगी जिस पर भारत का एआई भविष्य खड़ा होगा। यह सवाल उठाया जा रहा है कि भारत आज व्यवहार में एआई व रोबोटिक्स के अनुसंधान में कहां खड़ा है? आखिर गलगोटिया यूनिवर्सिटी के नीति-नियंताओं ने यह क्यों नहीं सोचा कि चीन निर्मित एक रोबोट को अपनी उपलब्धि बताने से देश की प्रतिष्ठा को आंच आएगी? अब यूनिवर्सिटी की तरफ से सफाई दी जा रही है कि उसने रोबोट के निर्माण का दावा नहीं किया। वहीं दूसरी ओर उन सरकारी अधिकारियों की भी जवाबदेही तय की जानी चाहिए, जिन्होंने बिना जांच-पड़ताल के विश्वविद्यालय को एआई समिट में स्टॉल लगाने की अनुमति क्यों दी। निश्चित रूप से भारत ने पिछले कुछ वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीक व रोबोटिक उत्पादन के क्षेत्र में ऊंची छलांग लगाई है। युवा शक्ति के देश भारत ने एआई के क्षेत्र में अमेरिका व चीन के बाद अपना तीसरा स्थान बनाया है। जिसकी पुष्टि अंतर्राष्ट्रीय मानक संस्थाओं ने भी की है। लेकिन एक विरोधाभासी हकीकत यह है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ी आबादी का देश है, जहां श्रम शक्ति प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।
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स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई की भूमिका क्रांतिकारी सिद्ध हो सकती है। रोगों की प्रारंभिक पहचान, सटीक निदान, दवाओं के शोध और ग्रामीण क्षेत्रों में टेलीमेडिसिन सेवाओं के विस्तार में एआई नई संभावनाएँ लेकर आया है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में जहाँ स्वास्थ्य संसाधनों का असमान वितरण है, वहाँ एआई आधारित समाधान दूरस्थ क्षेत्रों तक बेहतर सेवाएँ पहुँचाने में सहायक हो सकते हैं। इसी प्रकार कृषि क्षेत्र में मौसम पूर्वानुमान, मृदा विश्लेषण, फसल प्रबंधन और आपूर्ति श्रृंखला के अनुकूलन में एआई किसानों की आय बढ़ाने और जोखिम कम करने का माध्यम बन सकता है। जलवायु परिवर्तन की चुनौती भी आज मानवता के सामने विकराल रूप में उपस्थित है। चरम मौसम की घटनाएँ, जल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन विकास की गति को प्रभावित कर रहे हैं। एआई आधारित मॉडलिंग और डेटा विश्लेषण से प्राकृतिक आपदाओं का पूर्वानुमान, संसाधनों का बेहतर प्रबंधन और टिकाऊ नीतियों का निर्माण संभव है। यदि भारत इन क्षेत्रों में एआई का प्रभावी उपयोग करता है तो वह वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए एक मार्गदर्शक मॉडल प्रस्तुत कर सकता है।
शासन और आर्थिक विकास के क्षेत्र में भी एआई पारदर्शिता, जवाबदेही और दक्षता बढ़ाने का माध्यम बन सकता है। सार्वजनिक सेवाओं के डिजिटलीकरण, भ्रष्टाचार पर अंकुश, नीति निर्माण में डेटा-आधारित निर्णय और वित्तीय समावेशन के विस्तार में एआई की महत्वपूर्ण भूमिका है। इससे न केवल प्रशासनिक प्रक्रियाएँ सरल होंगी, बल्कि नागरिकों का विश्वास भी मजबूत होगा। आर्थिक दृष्टि से एआई नवाचार, स्टार्टअप संस्कृति और विनिर्माण क्षेत्र में नई ऊर्जा भर सकता है, जिससे रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे। किन्तु इस उजाले के साथ कुछ गहरी छायाएँ भी हैं। एआई के बढ़ते प्रभाव से रोजगार संरचना में परिवर्तन स्वाभाविक है। अनेक पारंपरिक नौकरियाँ समाप्त हो सकती हैं और नई कौशल-आधारित नौकरियों की माँग बढ़ेगी। यदि कौशल विकास और पुनर्प्रशिक्षण पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो असमानता और बेरोजगारी की समस्या गहरा सकती है। इसी प्रकार डेटा गोपनीयता, साइबर सुरक्षा, डीपफेक और निगरानी जैसे प्रश्न लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चुनौती बन सकते हैं। तकनीक का दुरुपयोग सामाजिक विभाजन और सूचना के दुष्प्रचार को बढ़ा सकता है।
इसलिए आवश्यक है कि एआई के विकास के साथ नैतिक ढाँचे और नियामक व्यवस्था भी सुदृढ़ हो। भारत को ऐसा मॉडल विकसित करना होगा जिसमें नवाचार की स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व का संतुलन बना रहे। “मानवता केंद्र में” का सिद्धांत केवल नारा न बने, बल्कि नीति और व्यवहार में परिलक्षित हो। एआई का उपयोग यदि समावेशी विकास, लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय के लिए किया जाए तो यह तकनीक समाज के कमजोर वर्गों के लिए अवसरों का द्वार खोल सकती है। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो चीन और अमेरिका एआई के क्षेत्र में तीव्र प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। भारत के सामने चुनौती है कि वह इस दौड़ में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए। भारत का लोकतांत्रिक ढाँचा, विविध सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और विशाल बाजार उसे एक अलग सामर्थ्य प्रदान करते हैं। यदि वह अनुसंधान में निवेश, स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र के सुदृढ़ीकरण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को प्राथमिकता दे तो वह एआई के क्षेत्र में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए सस्ती, सुलभ और मानव-केंद्रित तकनीक उपलब्ध कराकर भारत एक नैतिक नेतृत्व स्थापित कर सकता है।
‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026’ इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह सम्मेलन केवल विचारों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि भविष्य की संरचना का प्रारूप है। यहाँ से निकले संकल्प यदि नीति और क्रियान्वयन में रूपांतरित होते हैं तो भारत तकनीकी आत्मनिर्भरता की ओर एक बड़ा कदम बढ़ा सकेगा। यह अवसर है कि हम एआई को केवल आर्थिक लाभ का साधन न मानें, बल्कि उसे सामाजिक परिवर्तन और मानव कल्याण के माध्यम के रूप में देखें। आज जब दुनिया में मानवीय मूल्यों का क्षरण चिंता का विषय है, तब भारत के पास अवसर है कि वह तकनीक और नैतिकता के समन्वय का उदाहरण प्रस्तुत करे। एआई का विकास यदि करुणा, समावेशन और सतत विकास के आदर्शों के साथ हो तो यह मानवता के लिए वरदान सिद्ध होगा। भारत को अपने युवाओं, शोधकर्ताओं और नीति-निर्माताओं के माध्यम से यह सुनिश्चित करना होगा कि एआई की यात्रा मानवता के उत्थान की यात्रा बने, न कि केवल प्रतिस्पर्धा और वर्चस्व की।
निस्संदेह, ऐसे वक्त में जब कृषि से लेकर चिकित्सा तक और उत्पादन के क्षेत्र में एआई व रोबोटिक्स की दखल बढ़ रही है, प्रचुर श्रमशक्ति की उपलब्धता के बावजूद भारत को समय के साथ कदमताल करनी होगी। हमें एआई व रोबोटिक्स को अपनाना ही होगा। लेकिन सावधानी के साथ ताकि यह नौकरी खाने वाला बनने के बजाय नौकरी देने वाला बने। समय की पुकार है कि हम तकनीकी प्रगति को राष्ट्रीय संकल्प में बदलें। शिक्षा, अनुसंधान, कौशल विकास और नैतिक नेतृत्व के सहारे भारत एआई युग में एक नई पहचान गढ़ सकता है। यदि हम चुनौतियों को स्वीकार कर दूरदर्शिता से आगे बढ़ें तो यह युग भारत के लिए केवल तकनीकी उन्नति का नहीं, बल्कि वैश्विक नेतृत्व और मानवीय पुनर्जागरण का युग सिद्ध हो सकता है।
– ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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