दरअसल, इजराइल की रक्षा कंपनी Rafael Advanced Defense Systems द्वारा विकसित आइस ब्रेकर (Ice Breaker) मिसाइल को लेकर डिफेंस कॉरिडोर में बड़ी चर्चा है. रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत ने इस अत्याधुनिक लंबी दूरी की क्रूज मिसाइल के लिए ऑर्डर दिया है, जो भविष्य में इंडियन एयरफोर्स (Indian Air Force – IAF) की मारक क्षमता को नई ऊंचाई दे सकती है. यह मिसाइल सिर्फ हथियारों के जखीरे में बढ़ोतरी नहीं, बल्कि भारत की एयर वॉर स्ट्रैटजी में एक बड़े बदलाव का संकेत मानी जा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि आइस ब्रेकर मिसाइल भारतीय वायुसेना को अत्यधिक सुरक्षित दूरी से दुश्मन के ठिकानों पर हमला करने की क्षमता प्रदान करेगी. वर्ष 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एयरफोर्स ने रैम्पेज मिसाइल के जरिए आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए थे. उस अभियान ने स्टैंड-ऑफ स्ट्राइक यानी सुरक्षित दूरी से हमले की रणनीति की उपयोगिता साबित की थी. अब आइस ब्रेकर मिसाइल इस क्षमता को और उन्नत बनाती है. इसमें स्टील्थ तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोनोमस नेविगेशन जैसी विशेषताएं शामिल हैं, जिससे यह दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को भी भेद सकती है. यह तकनीक भारतीय वायुसेना को विवादित और अत्यधिक सुरक्षित हवाई क्षेत्रों में भी प्रभावी कार्रवाई करने में सक्षम बनाएगी.
A2/AD डिफेंस सिस्टम को भेदने में सक्षम
आधुनिक युद्ध में सबसे बड़ी चुनौती दुश्मन की A2/AD (एंटी-एक्सेस/एरिया डिनायल) सिस्टम को पार करना है. ये मल्टीलेयर एयर डिफेंस नेटवर्क ऐसे ‘नो-फ्लाई जोन’ बनाते हैं, जहां ट्रेडिशनल फाइटर जेट या पुराने हथियार आसानी से नष्ट हो सकते हैं. आइस ब्रेकर मिसाइल को विशेष रूप से ऐसी सुरक्षा व्यवस्था को चकमा देने के लिए डिजाइन किया गया है. यह जमीन के बेहद करीब उड़ान भरते हुए रडार की पकड़ से बचती है और अंतिम क्षणों में टार्गेट पर हमला करती है. इसकी ‘वेरी लो ऑब्ज़र्वेबल’ (VLO) डिजाइन इसे रडार से पकड़ना बेहद कठिन बना देती है. इससे लड़ाकू विमान सुरक्षित दूरी से मिसाइल लॉन्च कर सकते हैं, जिससे पायलटों का जोखिम कम होता है. इसका मतलब यह हुआ कि आइस ब्रेकर क्रूज मिसाइल चीन के HQ-9 और रूस के S-400 जैसे एयर डिफेंस सिस्टम को भी भेद सकती है.
आइस ब्रेकर मिसाइल क्या है और इसकी खासियत क्या है?
आइस ब्रेकर एक पांचवीं पीढ़ी की लंबी दूरी की एयर-लॉन्च क्रूज मिसाइल है, जिसमें स्टील्थ तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमैटिक टारगेट पहचान क्षमता मौजूद है. यह दुश्मन के सुरक्षित ठिकानों पर दूर से सटीक हमला करने में सक्षम है और आधुनिक हवाई युद्ध में “स्वायत्त हथियार” के रूप में देखी जा रही है.
यह मिसाइल उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम के खिलाफ कितनी प्रभावी है?
आइस ब्रेकर को खासतौर पर A2/AD (Anti-Access/Area Denial) सिस्टम को भेदने के लिए डिजाइन किया गया है. यह जमीन या समुद्र के बेहद करीब उड़ते हुए रडार से बचकर लक्ष्य तक पहुंचती है. इसका Very Low Observable डिजाइन इसे S-400 Triumf और HQ-9 जैसे मजबूत एयर डिफेंस नेटवर्क के लिए भी चुनौतीपूर्ण बनाता है.
इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर या GPS जामिंग का इस पर असर पड़ेगा या नहीं?
यह मिसाइल GNSS (सैटेलाइट नेविगेशन) पर निर्भर नहीं है. इसमें AI आधारित सीन मैचिंग और Imaging Infrared (IIR) सीकर तकनीक है, जो पहले से लोड किए गए 3D मैप से लक्ष्य पहचानती है. यानी GPS जाम होने पर भी यह सटीक हमला कर सकती है.
इससे भारतीय वायुसेना की ताकत कैसे बढ़ेगी?
लगभग 400 किलोग्राम से कम वजन वाली यह मिसाइल हल्के लड़ाकू विमानों पर भी लगाई जा सकती है. इससे HAL Tejas Mk1A और HAL Tejas Mk2 जैसे विमानों की मारक क्षमता बढ़ेगी. अभी भारी मिसाइलों जैसे BrahMos के लिए बड़े प्लेटफॉर्म की जरूरत पड़ती है. इस तरह ज्यादा स्क्वाड्रन लंबी दूरी के हमले करने में सक्षम होंगे.
भारत की सैन्य रणनीति में इसका क्या असर होगा?
रिपोर्ट्स के अनुसार 2027 तक इसे Sukhoi Su-30MKI बेड़े में शामिल करने की योजना है. एक साथ कई मिसाइलें अलग-अलग दिशा से हमला कर दुश्मन की सुरक्षा प्रणाली को भ्रमित कर सकती हैं. इससे पहले Operation Sindoor में इस्तेमाल Rampage missile ने स्टैंड-ऑफ स्ट्राइक की उपयोगिता साबित की थी, और आइस ब्रेकर उसी क्षमता को और उन्नत स्तर पर ले जाने वाली तकनीक मानी जा रही है.
इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग का तोड़
आधुनिक युद्ध में इलेक्ट्रॉनिक वॉर सिस्टम जैसे GPS जैमिंग और सिग्नल स्पूफिंग बड़ी चुनौती होती हैं, लेकिन आइस ब्रेकर मिसाइल इस खतरे से लगभग अप्रभावित मानी जा रही है. ‘इंडियन डिफेंस रिसर्च विंग’ की रिपोर्ट की मानें तो यह मिसाइल GNSS (ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम) पर निर्भर नहीं रहती, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित ‘सीन मैचिंग’ तकनीक और इमेजिंग इन्फ्रारेड (IIR) सीकर का उपयोग करती है. यह पहले से फीड किए गए 3D मैप्स और वास्तविक समय की तस्वीरों की तुलना कर खुद रास्ता तय करती है. इससे सैटेलाइट सिग्नल बाधित होने पर भी यह सटीक लक्ष्य तक पहुंच सकती है. जटिल युद्धक्षेत्रों जैसे शहरी इलाकों, बंदरगाहों या पहाड़ी ठिकानों में सही लक्ष्य की पहचान करना कठिन होता है. आइस ब्रेकर की ऑटोमैटिक टारगेट रिकग्निशन (ATR) तकनीक इस चुनौती को आसान बनाती है. यह तकनीक मिसाइल को विशिष्ट लक्ष्य जैसे जहाज का कमांड सेंटर, इंजन रूम या सैन्य ठिकाने को पहचानने में सक्षम बनाती है. साथ ही यह नकली लक्ष्यों और गैर-सैन्य क्षेत्रों से बचने में मदद करती है, जिससे अनावश्यक नुकसान कम होता है और मिशन की सफलता की संभावना बढ़ती है.
आइस ब्रेकर क्रूज मिसाइल काफी कम ऊंचाई की फ्लाइट के साथ टार्गेट पर अटैक कर सकती है. लो-एल्टीट्यूड होने की वजह से मॉडर्न रडार सिस्टम के लिए इसे इंटरसेप्ट या कैच कर पाना मुश्किल काम है. (फाइल फोटो/PTI)
हल्का वजन, पर घातक क्षमता
लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलों का भारी वजन अक्सर उनकी तैनाती को सीमित करता है. उदाहरण के लिए ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों को भारी लड़ाकू विमानों की जरूरत होती है. इसके विपरीत आइस ब्रेकर का वजन 400 किलोग्राम से कम है, जिससे हल्के लड़ाकू विमान भी इसे ले जा सकते हैं. यह क्षमता भारतीय वायुसेना की मारक शक्ति को अधिक विमानों में इंटीग्रेट करने में मदद करेगी. इससे युद्ध के दौरान अधिक लचीलापन मिलेगा और दुश्मन के लिए भारतीय हमले की रणनीति का अनुमान लगाना कठिन हो जाएगा. रिपोर्ट्स की मानें तो भारतीय वायुसेना वर्ष 2027 तक अपने सुखोई लड़ाकू विमानों के साथ आइस ब्रेकर मिसाइल को इंटीग्रेट करने की योजना बना रही है. इससे एक विमान से कई मिसाइलें दागकर (साल्वो अटैक) दुश्मन के रक्षा तंत्र को कई दिशाओं से एक साथ निशाना बनाया जा सकेगा. विशेषज्ञ इसे डिस्ट्रिब्यूटेड लेथैलिटी की दिशा में बड़ा कदम मानते हैं, जिसमें मिसाइलें आपस में समन्वय कर दुश्मन की सुरक्षा प्रणाली को भ्रमित और निष्क्रिय कर सकती हैं.
क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन पर असर
विश्लेषकों का मानना है कि आइस ब्रेकर मिसाइल की तैनाती से भारत की सामरिक क्षमता में महत्वपूर्ण वृद्धि होगी और क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन पर भी असर पड़ सकता है. यह तकनीक भारतीय वायुसेना को भविष्य के युद्धों में अधिक स्वायत्त, सटीक और सुरक्षित अभियान चलाने की क्षमता प्रदान करेगी. आइस ब्रेकर मिसाइल भारतीय वायुसेना के आधुनिकीकरण कार्यक्रम का अहम हिस्सा बन सकती है. स्टील्थ, AI और हाई-प्रिसीजन जैसी तकनीकों के साथ यह भारत की एयर पावर को नई दिशा देने वाला कदम माना जा रहा है.
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