सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि दोनों देशों ने साफ तौर पर माना कि मतभेद हैं, लेकिन उनका समाधान केवल संवाद से ही संभव है। यही वह संकेत है जो इस पूरे घटनाक्रम को साधारण कूटनीति से ऊपर उठाकर रणनीतिक पुनर्संतुलन की श्रेणी में ला देता है।
इसे भी पढ़ें: Strait of Hormuz Crisis | होर्मुज संकट के बीच भारत की बड़ी जीत! 46,000 मीट्रिक टन LPG लेकर ‘ग्रीन सांववी’ सुरक्षित रवाना
वहीं विदेश मंत्रालय स्तर की राजनीतिक वार्ता में अजरबैजान की ओर से उप विदेश मंत्री एलनुर ममदव और भारत की ओर से सिबी जार्ज ने नेतृत्व किया। इस दौरान न केवल द्विपक्षीय मुद्दों बल्कि मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव सहित वैश्विक और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों पर भी चर्चा हुई। साफ है कि यह वार्ता केवल दो देशों के रिश्तों तक सीमित नहीं थी, बल्कि व्यापक भू राजनीतिक संदर्भ से जुड़ी हुई थी।
हम आपको बता दें कि इस पूरी कहानी की जड़ ऑपरेशन सिंदूर में छिपी है, जिसने दोनों देशों के रिश्तों को गहरे संकट में डाल दिया था। भारत द्वारा पाकिस्तान स्थित आतंकी ठिकानों पर किए गए हमलों के बाद अजरबैजान ने खुलकर पाकिस्तान का पक्ष लिया था। दरअसल, अजरबैजान और पाकिस्तान के बीच गहरे सामरिक संबंध हैं। नागोर्नो कराबाख विवाद में पाकिस्तान ने अजरबैजान का साथ दिया, जबकि भारत ने आर्मेनिया के साथ अपने रक्षा संबंध मजबूत किए। यही वजह थी कि अजरबैजान ने भारत पर आर्मेनिया को हथियार देने का आरोप लगाया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ बयानबाजी भी की।
लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। अजरबैजान द्वारा भारत को कच्चे तेल की आपूर्ति फिर शुरू करना इस बात का संकेत है कि आर्थिक हित अंततः राजनीतिक मतभेदों पर भारी पड़ते हैं। भारत की ऊर्जा सुरक्षा में अजरबैजान की भूमिका बेहद अहम है, क्योंकि वहां से आने वाला तेल दोनों देशों के व्यापार का सबसे बड़ा हिस्सा है। इसके साथ ही ओएनजीसी विदेश की अजरबैजान की ऊर्जा परियोजनाओं में मौजूदगी इस रिश्ते को और गहराई देती है। यह केवल व्यापार नहीं बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी का आधार है।
हम आपको यह भी बता दें कि हाल के महीनों में एक और घटना ने दोनों देशों को करीब लाने का काम किया है। ईरान से भारतीय नागरिकों की निकासी में अजरबैजान ने अहम भूमिका निभाई है। जब हवाई मार्ग बंद थे, तब जमीनी रास्ते खोलकर सैंकड़ों भारतीयों को सुरक्षित बाहर निकाला गया। भारत ने इसके लिए खुलकर आभार जताया, जो इस नई शुरुआत की मजबूत नींव बन गया। करीब बारह सौ से अधिक भारतीय, जिनमें बड़ी संख्या में छात्र शामिल थे, इस प्रक्रिया के जरिए सुरक्षित निकले। यह केवल मानवीय सहयोग नहीं बल्कि भरोसे की पुनर्स्थापना थी।
रणनीतिक दृष्टि से देखें तो अजरबैजान काकेशस क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। यह क्षेत्र यूरोप और एशिया के बीच संपर्क का सेतु है। भारत के लिए यह ऊर्जा, व्यापार और संपर्क के लिहाज से बेहद अहम है। वहीं अजरबैजान के लिए भारत एक विशाल बाजार और उभरती वैश्विक शक्ति है।
देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश यह है कि वैश्विक राजनीति में स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होते, केवल हित स्थायी होते हैं। भारत और अजरबैजान दोनों ने यह समझ लिया है कि टकराव से ज्यादा फायदा सहयोग में है। लेकिन यह रास्ता आसान नहीं होगा। पाकिस्तान और आर्मेनिया जैसे कारक अब भी इस रिश्ते को प्रभावित करते रहेंगे। ऐसे में भारत को और अधिक आक्रामक, स्पष्ट और दीर्घकालिक रणनीति अपनानी होगी।
बहरहाल, बाकू में हुई यह बैठक केवल एक कूटनीतिक घटना नहीं बल्कि आने वाले समय की दिशा तय करने वाला मोड़ है। यह वह बिंदु है जहां से भारत और अजरबैजान के रिश्ते नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ सकते हैं या फिर पुराने मतभेद फिर सिर उठा सकते हैं। अब नजर इस बात पर है कि यह नई दोस्ती कितनी गहरी और कितनी टिकाऊ साबित होती है।
Discover more from Hindi News Blogs
Subscribe to get the latest posts sent to your email.