Kutki health tips : उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पाई जाने वाली जड़ी-बूटी कुटकी हमेशा चर्चाओं में रहती है. आयुर्वेद में कुटकी को लिवर स्वास्थ्य और पाचन तंत्र के लिए बेहद लाभकारी माना गया है. ये बागेश्वर, पिथौरागढ़ और चमोली के ऊंचाई वाले इलाकों में प्राकृतिक रूप से उगती है. लोकल 18 से बात करते हुए बागेश्वर के आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. ऐजल पटेल बताते हैं कि आयुर्वेद में इसे पित्त दोष शांत करने वाली जड़ी कहा गया है. जिन लोगों को शरीर में अधिक गर्मी, मुंह कड़वा रहना, जलन या सिर भारी लगने जैसी शिकायतें रहती हैं, उनके लिए कुटकी रामबाण है.
कुटकी एक दुर्लभ हिमालयी जड़ी-बूटी है, जो उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पाई जाती है. बागेश्वर, पिथौरागढ़ और चमोली के ऊंचाई वाले इलाकों में प्राकृतिक रूप से उगती है. आयुर्वेद में कुटकी को कड़वे स्वाद और ठंडी तासीर वाली औषधि माना जाता है. पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में इसका उपयोग खासकर लिवर और पाचन तंत्र से जुड़ी समस्याओं में किया जाता है. जड़ी का मुख्य उपयोग इसकी जड़ के रूप में होता है, जिसे सुखाकर चूर्ण बनाया जाता है. पहाड़ के वैद्य इसे शुद्धिकरण और संतुलन देने वाली औषधि के रूप में पहचानते हैं.

कुटकी को लिवर टॉनिक के रूप में जाना जाता है. बागेश्वर के आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. ऐजल पटेल बताते हैं कि इसे फैटी लिवर और लिवर की सुस्ती से जुड़ी समस्याओं में सहायक माना जाता है. कुटकी शरीर से विषैले तत्व बाहर निकालने और लिवर की कार्यक्षमता बेहतर करने में मददगार है. यह पित्त संतुलन में भी भूमिका निभाती है, जिससे लिवर पर दबाव कम हो सकता है. हालांकि इसे दवा का विकल्प नहीं बल्कि सहायक जड़ी के रूप में ही देखा जाना चाहिए.

कुटकी का उपयोग अपच, गैस, पेट भारी लगना और भूख कम लगने जैसी समस्याओं में किया जाता रहा है. इसका कड़वा स्वाद पाचन अग्नि को सक्रिय करता है. स्थानीय वैद्य बताते हैं कि थोड़ी मात्रा में कुटकी चूर्ण लेने से भोजन पचने में आसानी होती है. यह आंतों की सफाई और पित्त संतुलन में भी सहायक है. जिन लोगों को बार-बार एसिडिटी या पेट में जलन की समस्या रहती है, उनके लिए भी इसे सीमित मात्रा में उपयोगी बताया जाता है. लगातार परेशानी होने पर जांच जरूरी है.
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कुटकी की तासीर ठंडी मानी जाती है, इसलिए आयुर्वेद में इसे पित्त दोष शांत करने वाली जड़ी कहा गया है. जिन लोगों को शरीर में अधिक गर्मी, मुंह कड़वा रहना, जलन या सिर भारी लगने जैसी शिकायतें रहती हैं, उनके लिए कुटकी का उपयोग लाभदायक है. पहाड़ी क्षेत्रों में इसे गर्मियों के मौसम में अधिक उपयोगी माना जाता है. यह शरीर के अंदरूनी संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है. हालांकि हर व्यक्ति की प्रकृति अलग होती है, इसलिए ठंडी तासीर वाली जड़ी का उपयोग भी सोच-समझकर और सलाह के साथ करना चाहिए.

कुटकी को हल्के बुखार, सर्दी-जुकाम और मौसमी संक्रमण में सहायक जड़ी के रूप में जाना जाता है. पारंपरिक नुस्खों में कुटकी को अन्य जड़ी-बूटियों के साथ मिलाकर दिया जाता है. ये रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है. थकान और कमजोरी की स्थिति में जब पाचन कमजोर हो तब भी इसका सीमित उपयोग किया जाता है, लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि तेज बुखार या गंभीर संक्रमण में केवल जड़ी-बूटी पर निर्भर रहना सुरक्षित नहीं है. ऐसे मामलों में चिकित्सकीय उपचार प्राथमिक होना चाहिए.

कुटकी आमतौर पर चूर्ण के रूप में ली जाती है. आयुर्वेदिक चिकित्सक अक्सर 250 से 500 मिलीग्राम तक की छोटी मात्रा गुनगुने पानी या शहद के साथ लेने की सलाह देते हैं. कुछ मामलों में इसे काढ़े के रूप में भी उपयोग किया जाता है. इसे खाली पेट या भोजन के बाद किस समय लेना है, यह समस्या और व्यक्ति की प्रकृति पर निर्भर करता है. खुद से मात्रा तय करना ठीक नहीं है. अधिक मात्रा लेने से फायदा बढ़ेगा यह धारणा गलत है. सही मात्रा और अवधि तय करने के लिए विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर रहता है.

कुटकी का अधिक मात्रा में सेवन करने से दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं. ज्यादा लेने पर दस्त, उल्टी, पेट दर्द या कमजोरी महसूस हो सकती है. चूंकि यह तेज प्रभाव वाली कड़वी जड़ी है, इसलिए सीमित मात्रा में ही उपयोग उचित माना जाता है. लंबे समय तक लगातार सेवन भी बिना निगरानी के नहीं करना चाहिए. जिन लोगों का वजन बहुत कम है या पाचन पहले से कमजोर है, उन्हें खास सावधानी रखनी चाहिए. बच्चों और बुजुर्गों में भी मात्रा अलग रखी जाती है. इसलिए प्राकृतिक है तो सुरक्षित है, यह मानकर अति सेवन नहीं करना चाहिए.

गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को कुटकी का सेवन बिना चिकित्सकीय सलाह के नहीं करना चाहिए. जो लोग पहले से लिवर, शुगर या अन्य गंभीर बीमारियों की दवा ले रहे हैं, उन्हें भी सावधानी जरूरी है. कुटकी कुछ दवाओं के असर को प्रभावित कर सकती है. एलर्जी प्रवृत्ति वाले लोगों को पहली बार बहुत कम मात्रा से शुरू करना चाहिए. यदि सेवन के बाद कोई असामान्य लक्षण दिखे तो तुरंत बंद कर डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां लाभकारी हो सकती हैं, लेकिन सही व्यक्ति, सही मात्रा और सही सलाह के साथ ही उनका उपयोग सुरक्षित है.
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