देशभर के 20 केंद्रों से जुटाए गए आंकड़े
यह स्टडी भारतीय बाल रक्त एवं कैंसर समूह की ओर से शुरू की गई थी. इसकी शुरुआत 2016 में हुई थी, हालांकि, इसकी योजना 2014 में तैयार कर ली गई थी. इस अध्ययन में देश के 20 बड़े मेडिकल केंद्रों से डेटा जुटाया गया, जिनमें दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता और बेंगलुरु जैसे शहर शामिल हैं. कुल 5400 से ज्यादा बच्चों को इसमें ट्रैक किया गया, जिन्होंने अपना कैंसर उपचार पूरा कर लिया था. यह अध्ययन एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल में भी प्रकाशित हुआ है, जिससे इसकी विश्वसनीयता और बढ़ गई है.
सर्वाइवल रेट ने बढ़ाई उम्मीद
अध्ययन के अनुसार, पांच साल का कुल सर्वाइवल रेट 94.5 प्रतिशत पाया गया. यानी इलाज के पांच साल बाद भी इतने बच्चे जीवित रहे. इवेंट फ्री सर्वाइवल रेट 89.9 प्रतिशत दर्ज किया गया, जिसका मतलब है कि इतने बच्चों में दोबारा बीमारी या गंभीर जटिलता नहीं हुई. इलाज के दो साल बाद यह सर्वाइवल रेट 98.2 प्रतिशत तक पहुंच गया. दिसंबर 2024 तक उपलब्ध फॉलोअप डेटा के अनुसार 92 प्रतिशत बच्चे जिंदा और रिमिशन में पाए गए. यह आंकड़े इस बात का संकेत हैं कि अब भारत में बाल कैंसर का इलाज पहले से कहीं बेहतर हुआ है.
ल्यूकेमिया के सबसे ज्यादा मामले
इस अध्ययन में पाया गया कि कुल मामलों में से 41 प्रतिशत बच्चे ल्यूकेमिया से पीड़ित थे, जो इस समूह में सबसे सामान्य कैंसर रहा. इसके अलावा हॉजकिन लिम्फोमा, हड्डी के ट्यूमर और रेटिनोब्लास्टोमा भी प्रमुख बीमारियों में शामिल रहे. लगभग सभी बच्चों को कीमोथेरेपी दी गई. हर चार में से एक बच्चे को रेडियोथेरेपी की जरूरत पड़ी. करीब एक तिहाई बच्चों की सर्जरी हुई और आधे से ज्यादा बच्चों को ब्लड ट्रांसफ्यूजन की आवश्यकता पड़ी.
इलाज के बाद की चुनौतियां भी अहम
डॉक्टरों का कहना है कि अब केवल बच्चों को बचाना ही लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह भी जरूरी है कि इलाज के बाद उनकी जिंदगी कैसी होगी. कैंसर से उबरने के बाद भी कई बच्चों को लंबी अवधि की स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं. इनमें प्रजनन से जुड़ी परेशानी, दिल की दिक्कत, याददाश्त या सीखने की क्षमता में कमी, दोबारा कैंसर होने का खतरा या दूसरा कैंसर विकसित होना शामिल है. पहले भारत में ऐसे मामलों का अपना डेटा नहीं था और डॉक्टर पश्चिमी देशों के आंकड़ों पर निर्भर रहते थे. अब इस स्टडी से भारत को अपना आधार मिला है.
फॉलोअप और भविष्य की दिशा
इस समय लगभग 35 से 36 केंद्र इस कार्यक्रम से जुड़ चुके हैं और डेटा दे रहे हैं. अब तक का औसत फॉलोअप समय 3.9 साल रहा है. अध्ययन के अनुसार 5.7 प्रतिशत बच्चों में दोबारा बीमारी लौटी और 4.9 प्रतिशत बच्चों की फॉलोअप अवधि के दौरान मौत हुई. हालांकि ये आंकड़े चुनौती दिखाते हैं, फिर भी कुल मिलाकर सर्वाइवल रेट उम्मीद जगाने वाला है. विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले वर्षों में और बेहतर इलाज और निगरानी से परिणाम और सुधर सकते हैं.
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