गणगौर 21 मार्च, शनिवार को मनाई जाएगी। पंचांग के हिसाब से यह पर्व चैत्र शुक्ल तृतीया को पड़ता है। गणगौर को गौरी तृतीया भी कहा जाता है। चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष के तीसरे दिन शिव-पार्वती की पूजा और व्रत होता है। इसमें लड़कियां और शादीशुदा महिलाएं मिट्टी के शिव यानी गण और देवी पार्वती यानी गौर बनाती हैं। फिर उनकी पूजा करती हैं। सुहागन, पति की लंबी उम्र के लिए और लड़कियां अच्छे पति की कामना से व्रत करती हैं। राजस्थान की परंपरा में यह पर्व विशेष रूप से महिलाओं का उत्सव माना जाता है। शादीशुदा औरतें सोलह श्रृंगार करके ये व्रत और पूजा करती हैं। वहीं, लड़कियां भी पूरी तरह सजकर पूरे विधि-विधान से पूजा करती हैं। पौराणिक कथा के मुताबिक माना जाता है कि गौरा यानी देवी पार्वती ने भी शिवजी के लिए तप और व्रत किया था। इसके बाद ही उन्हें पति रूप में शिवजी मिले। इसी वजह से गणगौर में गौरी को सौभाग्य, दांपत्य सुख और शुभ वर की कामना से पूजा जाता है। पुराणों में भी इस व्रत का जिक्र है। नारद पुराण के उत्तरभाग में कहा गया है कि चैत्र शुक्ल तृतीया महाफलदायी है और उस दिन गौरी का भक्ति भाव से पूजन करना चाहिए। स्कंद पुराण में भी गौरी तृतीया का जिक्र मिलता है। ‘गण’ भगवान शिव का और ‘गौर’ या ‘गौरी’ माता पार्वती का नाम है। इसी कारण इस दिन शिव-पार्वती की संयुक्त पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। राजस्थान में यह पूजा होली के अगले दिन से शुरू होकर 18वें दिन गणगौर पर पूरी होती है। शिव-पार्वती की विशेष पूजा देवी पार्वती के साथ ही इस दिन शिवजी की भी विशेष पूजा होती है। मान्यता है कि ऐसा करने से पति की उम्र बढ़ती है और हर तरह की परेशानियां दूर होती हैं। इस दिन भगवान शिव को शुद्ध जल, ताजा दूध, पंचामृत, चंदन, बिल्वपत्र, और परंपरा के अनुसार उपलब्ध पूजन सामग्री चढ़ाई जाती है। गणगौर में कई जगह ईसर-गौर की प्रतिमाओं को सजाकर गीत गाए जाते हैं, जल अर्पित किया जाता है और अगले दिन विसर्जन भी किया जाता है। गणगौर पर देवी पार्वती की भी विशेष पूजा करने का विधान है। क्योंकि यह पर्व गौरी तृतीया से जुड़ा है, इसलिए माता गौरी की पूजा, श्रृंगार और सुहाग सामग्री का अर्पण प्रमुख माना जाता है। देवी पार्वती की पूजा 16 श्रृंगार से करनी चाहिए। कुमकुम, हल्दी और मेहंदी खासतौर से चढ़ानी चाहिए। सुगंधित चीजें भी अर्पित करें। कई जगह महिलाएं लोकगीत गाते हुए गणगौर की प्रतिमाओं को सिर पर रखकर नदी, तालाब तक ले जाती हैं।
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