चुनाव में फ्री राशन, महिलाओं को नकदी जैसी ‘मुफ्त की रेवड़ियों’ वाली योजनाएं राज्यों के लिए बड़ा बोझ बन रही हैं। हालत यह है कि इनको पूरा करने के लिए राज्य न पर्याप्त संसाधन जुटा पा रहे हैं और न संतुलित बजट बना पा रहे हैं। कुछ राज्यों में तो इन घोषणाओं का बोझ कुल राजस्व प्राप्तियों के 30 से 40% तक पहुंच गया है। हिमाचल जैसे छोटे राज्य में नकदी संकट की विकट स्थिति है। राज्य में सीएम, मंत्री, विधायकों समेत अफसरों के वेतन-पेंशन टालने पड़े। तेलंगाना को चुनावी घोषणाओं के लिए हर साल 1 लाख करोड़ चाहिए, पर बजट की कमी से कई योजनाएं अटकी हैं। मप्र में लाड़ली बहना योजना के चलते GSDP के मुकाबले कर्ज 27% से बढ़कर 32% पहुंच गया। महाराष्ट्र में लाडकी बहिन योजना के दबाव के कारण त्योहारों में मिलने वाली राशन किट योजना बंद कर दी गई है। एक्सपर्ट कमेंट… कैश ट्रांसफर जैसे चुनावी वादे जारी रहे तो भले देश की इकोनॉमी बेहतर रहे, पर राज्य डिफॉल्ट कर सकते हैं। हिमाचल के जैसे ही दूसरे राज्य भी खर्च में कटौती कर रहे हैं। डॉ. अमरजीत सिंह सेठी, इंडियन एसोसिएशन फॉर रिसर्च इन नेशनल इनकम एंड वेल्थ के एडिटर संकट क्यों: घोषणाएं ज्यादा, कमाई कम
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