डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन (48) ने आम चुनाव में हार के बाद इस्तीफा दे दिया है। बुधवार को मतगणना में उनकी सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी को महज 38 सीटें मिलीं। हालांकि, अभी वहां किसी भी पार्टी को बहुमत हासिल नहीं हुआ है। मेटे जून 2019 से डेनमार्क की प्रधानमंत्री थीं और 2022 में दोबारा सत्ता में लौटी थीं। वे 41 की उम्र में पद संभालने वाली देश की सबसे कम उम्र की प्रधानमंत्री बनी थीं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प से ग्रीनलैंड के मुद्दे पर बेबाकी से लेकर सादगी तक के उनके कई किस्से हैं। मेटे बचपन से ही शांत और संकोची रहीं। बोलने में हकलाहट के कारण स्कूल में बच्चे उनका मजाक उड़ाते थे। उन्हें लंबे समय तक स्पीच थेरेपी लेनी पड़ी। वे 90 के दशक में पर्यावरण और पशु अधिकारों को लेकर वे बेहद आक्रामक रहीं। कॉस्मेटिक कंपनियों द्वारा जानवरों पर परीक्षण के विरोध में उन्होंने मेकअप प्रोडक्ट इस्तेमाल करना ही छोड़ दिया। उनका मानना था कि जानवरों को दर्द देकर सुंदरता पाना गलत है। इसी दौर में उन्होंने ‘जेंस’ नाम की एक व्हेल को प्रतीकात्मक रूप से गोद लिया और अपनी पॉकेट मनी से समुद्री संरक्षण संस्था को राशि देकर उसकी सुरक्षा, ट्रैकिंग और प्राकृतिक आवास बचाने में सहयोग किया। 2012 में रोजगार मंत्री रहते हुए मेटे साधारण कपड़ों और फ्लैट जूतों में बच्चों को साइकिल से स्कूल छोड़ने जाती थीं। तब जनता में उनकी सादगी के खूब चर्चे होते थे। मेटे अपनी बेबाक जवाब के लिए मशहूर हैं। जनवरी 2026 में ट्रम्प ने ग्रीनलैंड पर कब्जे की जिद पकड़ ली। जवाब में झुकने के बजाय मेटे ने ग्रीनलैंड की सुरक्षा के लिए डेनिश कमांडो और सैनिक तैनात कर दिए। उन्होंने दो टूक कहा, ‘डेनमार्क बिकाऊ नहीं है। अगर अमेरिका नाटो सहयोगी पर हमला करता है, तो सब खत्म हो जाएगा।’ ट्रम्प की धमकी ने उल्टा मेटे की लोकप्रियता बढ़ाई। महिलाओं की पहचान और आत्मविश्वास पर मेटे कहती हैं, अगर लड़कियां खुद को कमतर आंकना छोड़ दें और भरोसे के साथ खड़ी हों, तो वे दुनिया में कुछ भी हासिल कर सकती हैं। 15 की उम्र में शरणार्थी को बचाने में टूट गई थी नाक की हड्डी मेटे बचपन से ही निडर रहीं। 15 की उम्र में अल्बोर्ग में उन्होंने कुछ लड़कों को एक शरणार्थी को परेशान करते देखा तो अकेले ही भिड़ गईं। इसी दौरान एक लड़के ने नस्लवादी अपशब्द कहते हुए उनके चेहरे पर मुक्का मारा, जिससे उनकी नाक की हड्डी टूट गई। इसके बाद उन्हें अस्तपताल में भर्ती होकर इलाज करवाना पड़ा। मेटे कहती हैं, यह चोट डर नहीं, उनके साहस की पहचान थी।
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