बात तब की है, जब बिल गेट्स जवान थे और अपने सपनों को आकार दे रहे थे. माइक्रोसॉफ्ट की स्थापना तो हो चुकी थी, लेकिन तब ये न तो कोई दिग्गज टेक कंपनी थी, न ही उसका नाम आम लोगों की जुबान पर था. कोडिंग इत्यादी का काम तो बिल गेट्स ने खुद कर लिया था, लेकिन उन्हें यह भी आभास था कि कंपनी केवल कोडिंग से नहीं चल सकती. कंपनी को बिजनेस और कारोबार समझने वाले किसी मजबूत हैंड की भी जरूरत है. बिल गेट्स ने काफी सोच विचार के बाद हार्वर्ड के अपने पुराने दोस्त स्टीव बाल्मर को फोन लगाया और उसके सामने एक ऐसा प्रस्ताव रखा, जिसने दोनों की जिंदगी की दिशा बदल दी.
मुनाफे में 10 परसेंट हिस्सेदारी
बाल्मर उस समय एक सिक्योर करियर की राह पर थे. वे प्रॉक्टर एंड गैंबल में काम कर चुके थे और स्टैनफोर्ड से एमबीए कर रहे थे. उनके सामने जमा-जमाया भविष्य था, जबकि माइक्रोसॉफ्ट के साथ जुड़ना किसी जोखिम से कम नहीं था. बिल गेट्स ने बाल्मर को करीब 50,000 डॉलर सालाना वेतन और जो भी मुनाफा वो लाएंगे, उसमें 10 फीसदी हिस्सेदारी का प्रस्ताव दिया. उस वक्त बाल्मर को कंपनी में सीधे तौर पर इक्विटी (शेयर) नहीं मिली थी. लेकिन जैसे-जैसे कंपनी का मुनाफा बढ़ा, वह सिस्टम माइक्रोसॉफ्ट को महंगा लगने लगा. 1981 में जब कंपनी को कॉर्पोरेशन में बदला गया, तब प्रॉफिट शेयरिंग की जगह बाल्मर को कंपनी में लगभग 8 फीसदी हिस्सेदारी दे दी गई. उस समय उन शेयरों की कोई ठोस कीमत नहीं थी, इसलिए यह फैसला भरोसे और दूरदृष्टि पर टिका हुआ था.
कैसे हुई बाल्मर और बिल गेट्स की दोस्ती?
डेट्रॉयट में पले-बढ़े बाल्मर पढ़ाई में तेज थे और गणित में खास पकड़ रखते थे. हार्वर्ड में गेट्स से उनकी दोस्ती सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं रही, बल्कि विचारों की साझेदारी में बदल गई. जब वे माइक्रोसॉफ्ट से जुड़े, तब वे कंपनी के लगभग 30वें कर्मचारी थे. शुरुआत में उनका काम केवल बिजनेस संभालना नहीं था, वे हर छोटे-बड़े फैसले में शामिल रहते थे. उनका स्वभाव गेट्स से बिल्कुल अलग था. जहां गेट्स शांत और टेक्नोलॉजी पर फोकस रखते थे, वहीं बाल्मर जोश से भरे हुए दिखाई देते थे. वे कर्मचारियों में उत्साह भरने के लिए जाने जाते थे, और कंपनी के विस्तार में उनकी भूमिका लगातार बढ़ती गई.
बिल गेट्स ने CEO पद दिया बाल्मर को
साल 2000 में गेट्स ने सीईओ पद छोड़कर जिम्मेदारी बाल्मर को सौंप दी. यह दौर आसान नहीं था. बाजार में Google और Apple जैसी कंपनियां तेजी से उभर रही थीं. आलोचकों ने कहा कि माइक्रोसॉफ्ट स्मार्टफोन और सर्च इंजन की दौड़ में पीछे रह गई. फिर भी आंकड़े बताते हैं कि बाल्मर के कार्यकाल में कंपनी का रेवेन्यू लगभग तीन गुना और मुनाफा दोगुना हुआ. विंडोज और ऑफिस ने अपनी पकड़ मजबूत रखी और क्लाउड सेवाओं की नींव रखी गई, जिसका लाभ आगे चलकर कंपनी को मिला.
14 वर्षों में कहां से कहां पहुंच गई कंपनी
2014 में जब बाल्मर ने सीईओ पद छोड़ा, तब माइक्रोसॉफ्ट का बाजार मूल्य लगभग 315 अरब डॉलर था. बाद में सत्या नडेला (Satya Nadella) के नेतृत्व में क्लाउड और एआई पर जोर दिया गया और कंपनी का मूल्य 3 ट्रिलियन डॉलर से भी आगे निकल गया. बाल्मर ने अपने अधिकांश शेयर संभालकर रखे. आज उनके पास 4 फीसदी से कुछ अधिक हिस्सेदारी है. सिर्फ डिविडेंड के रूप में वे हर साल करीब 1 अरब डॉलर प्राप्त करते हैं. उनकी संपत्ति बिल गेट्स से अधिक होने की एक वजह ये भी है कि गेट्स ने अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा दान में दे दिया है, जबकि बाल्मर ने निवेश को लंबे समय तक थामे रखा.
आज बाल्मर एनबीए टीम Los Angeles Clippers के मालिक हैं, और कॉर्पोरेट इतिहास में एक अनोखी मिसाल माने जाते हैं. वे कंपनी के संस्थापक नहीं थे, फिर भी एक कर्मचारी और सीईओ के रूप में 100 अरब डॉलर से अधिक की संपत्ति तक पहुंचे.
स्टीव बाल्मर को मिले डिविडेंड की डिटेल
| वर्ष (Year) | प्रति शेयर डिविडेंड (सालाना) | अनुमानित कमाई (USD) | भारतीय रुपयों में (लगभग) |
| 2025 (Projected) | $3.32 | $1.10 बिलियन | ₹9,130 करोड़ |
| 2024 | $3.00 | $999.6 मिलियन | ₹8,300 करोड़ |
| 2023 | $2.79 | $930 मिलियन | ₹7,720 करोड़ |
| 2022 | $2.48 | $826 मिलियन | ₹6,850 करोड़ |
| 2021 | $2.24 | $746 मिलियन | ₹6,190 करोड़ |
बिल गेट्स के पास कितने शेयर?
बिल गेट्स के पास माइक्रोसॉफ्ट में हिस्सेदारी 1% से भी कम (लगभग 0.5% से 0.9% के बीच) बची है. हालांकि उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट की स्थापना की थी और कभी उनके पास 45% तक शेयर हुआ करते थे, लेकिन पिछले दो दशकों में उन्होंने अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन (Bill & Melinda Gates Foundation) में दान कर दिया है. 2020 में गेट्स ने माइक्रोसॉफ्ट के बोर्ड से इस्तीफा दे दिया था, ताकि वे जलवायु परिवर्तन, वैश्विक स्वास्थ्य और विकास जैसे परोपकारी कार्यों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकें.
माइक्रोसॉफ्ट के अधिकांश शेयर अब संस्थागत निवेशकों जैसे द वैनगार्ड ग्रुप (Vanguard Group) और ब्लैकरॉक (BlackRock) के पास हैं.
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