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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार- फाइल फोटो
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए संसद में विपक्षी सांसदों ने नोटिस दिया है। लोकसभा-राज्यसभा में लाए गए नोटिस में CEC पर 7 आरोप है लगाए गए हैं। यह कहा गया है कि वे सरकार के इशारे पर काम करते हैं।
विपक्ष का आरोप है कि ज्ञानेश कुमार ने SIR के जरिए लोगों के वोट देने के अधिकार छीन लिया। नोटिस में उनकी नियुक्ति पर भी सवाल उठाए गए हैं।
12 मार्च को संसद के दोनों सदन में जमा किए गए नोटिस में CEC के खिलाफ साबित दुर्व्यवहार के आधार पर उन्हें हटाने की मांग की गई है।
लोकसभा में 130 और राज्यसभा में 63 विपक्षी सांसदों ने CEC को हटाने के लिए एक प्रस्ताव लाने की भी मांग की है।
CEC के खिलाफ विपक्ष के 7 आरोप
विपक्ष के आरोपों में कुमार की CEC के तौर पर नियुक्ति की प्रक्रिया, 17 अगस्त 2025 को राहुल गांधी को निशाना बनाते हुए उनकी पक्षपातपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस, विपक्ष और सत्ताधारी दल के सदस्यों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार, जांच में बाधा डालना, पारदर्शिता के साधन उपलब्ध कराने से इनकार करना और सत्ताधारी दल के राजनीतिक उद्देश्यों के अनुरूप ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) प्रक्रिया को लागू करना शामिल है।
यह दावा किया जा रहा है कि विपक्ष मानसूत्र सत्र के दौरान CEC के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव ला सकता है। महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए 14 दिन पहले नोटिस देना जरूरी होता है।

पढ़ें विपक्ष के नोटिस की बड़ी बातें…
- चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल: विपक्ष CEC ने ECI को एक निष्पक्ष चुनावी संस्था से बदलकर, कार्यपालिका के राजनीतिक एजेंडे को लागू करने वाले एक ‘माध्यम’ में बदल दिया है। उन्होंने इसे एक निष्पक्ष चुनाव कराने वाली संस्था से बदलकर, नागरिकता तय करने वाले एक ट्रिब्यूनल में तब्दील कर दिया है।
- बिहार चुनाव से पहले SIR की शर्तें थोपीं: बिहार विधानसभा चुनावों से ठीक 5 महीने पहले की गई SIR की प्रक्रिया ने दस्तावेजों से जुड़ी ऐसी शर्तें थोप दी थीं, जिनका नतीजा हुआ कि समाज के सबसे कमजोर तबकों को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया। 65 लाख वोटर्स इससे प्रभावित हुए।
- पक्षपाती मानसिकता और कार्यशैली: CEC ने बड़े राज्यों में जहां 2-3 महीने में चुनाव होने थे, वहां SIR की प्रक्रिया रॉकेट जैसी तेजी से की। समय-सीमा पर दोबारा विचार करने को लेकर अड़ियल रवैया रखा। लोगों की तकलीफों को लेकर पूरी तरह से असंवेदनशीलता रहे। विपक्ष की हर गुहार को जान-बूझकर नजरअंदाज किया।
- बंगाल में लाए बिहार मॉडल: बिहार वाले मॉडल को ही दूसरे राज्यों में भी दोहराया। बंगाल में जारी किए गए ड्राफ्ट इलेक्टोरल रोल्स से पता चला कि 7.66 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 58 लाख नाम हटा दिए गए थे। 60 लाख से ज्यादा मतदाता अभी भी जांच के दायरे में हैं, जिससे विधानसभा चुनावों से ठीक कुछ हफ्ते पहले भी उनके वोट देने के अधिकार को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
- CEC की चयन प्रक्रिया: CEC की चयन की प्रक्रिया का मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में एक संवैधानिक चुनौती के तौर पर लंबित है। नोटिस में राहुल गांधी ने फरवरी 2025 में दर्ज कराई गई असहमति का भी जिक्र है। कहा गया है जिस जल्दबाज़ी में आधी रात को यह नियुक्ति की गई, उससे यह साफ जाहिर है कि सरकार जान-बूझकर अपनी पसंद के व्यक्ति को पद पर बिठाना चाहती थी।
- न्याय में जानबूझकर बाधा डालना: CEC पर आरोप है कि कर्नाटक के अलंद में मतदाता सूची में धोखाधड़ी के आरोपों, मशीन-रीडेबल वोटर लिस्ट देने से इनकार, मतदान केंद्रों से CCTV फुटेज जारी करने से इनकार किया। EC एक अपारदर्शी और जवाबदेही से बचने संस्था बन गई है।
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