जब डायरेक्टर राकेश कुमार ने ‘शोले’ के खतरनाक गब्बर सिंह (अमजद खान) को अमिताभ बच्चन का करीबी दोस्त बनाने का फैसला किया, तो इंडस्ट्री के लोगों ने उनसे कहा कि फिल्म डूब सकता है. हर कोई हैरान था कि एक बेरहम विलेन पर्दे पर ‘मसीहा’ दोस्त कैसे बन सकता है. लेकिन जब 1981 में ‘याराना’ रिलीज हुई, तो बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रच दिया गया. अमजद खान की इमोशनल परफॉर्मेंस ने दर्शकों का इतना दिल जीता कि कई मौकों पर तो वे सुपरस्टार अमिताभ बच्चन पर भी भारी पड़ गए. ‘तेरे जैसा यार कहां’ जैसे सदाबहार गानों से सजी यह फिल्म आज भी दोस्ती की एक बेहतरीन मिसाल है.
नई दिल्ली. साल 1975 बॉलीवुड के इतिहास में एक मील का पत्थर था, क्योंकि यही वह साल था जब दुनिया को ‘गब्बर सिंह’ जैसा खतरनाक विलेन मिला. अमजद खान की रोंगटे खड़े कर देने वाली आवाज और खतरनाक एक्टिंग ने ऐसा डर पैदा किया कि इंडस्ट्री उन्हें सिर्फ विलेन के तौर पर ही देख सकती थी. लेकिन सिर्फ छह साल बाद, 1981 में एक डायरेक्टर ने कुछ ऐसा कर दिखाया जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. डायरेक्टर राकेश कुमार ने गब्बर सिंह को भगवान जैसा दोस्त बनाने का रिस्क लिया और नतीजा एक ऐसी फिल्म बनी जिसे आज एवरग्रीन माना जाता है- ‘याराना.’

मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि जब ‘याराना’ की स्क्रिप्ट डेवलप हो रही थी, तो ‘बिशन’ का कैरेक्टर सेंट्रल था. बिशन वो दोस्त था जिसे अपने दोस्त ‘किशन’ (अमिताभ बच्चन) के टैलेंट पर पक्का भरोसा था और उसे सुपरस्टार बनाने के लिए अपनी प्रॉपर्टी भी गिरवी रख सकता था. जब राकेश कुमार ने इस रोल के लिए अमजद खान को प्रपोज किया, तो पूरी इंडस्ट्री हिल गई. ट्रेड एनालिस्ट और डिस्ट्रीब्यूटर का मानना था कि ऑडियंस उस आदमी को कभी भी एक्सेप्ट नहीं करेगी जिसने स्क्रीन पर ठाकुर के हाथ काट दिए और जय (अमिताभ) को मार डाला, एक सैक्रिफाइस करने वाले दोस्त के तौर पर. कई लोगों ने तो यह भी प्रेडिक्ट किया कि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो जाएगी.

जब फिल्म की शूटिंग शुरू हुई, तो एक तरफ ‘एंग्री यंग मैन’ अमिताभ बच्चन थे और दूसरी तरफ ‘विलेन’ अमजद खान. लेकिन सेट पर माहौल अलग था. असल जिंदगी में, दोनों बहुत करीबी दोस्त थे. अपनी भारी आवाज और रौद्र रूप के लिए मशहूर अमजद खान असल में बहुत नरम दिल और मजाकिया इंसान थे. फिल्म के कई सीन में जब अमजद खान को अमिताभ के लिए रोना या इमोशनल होना था, तो उन्होंने इतनी शिद्दत से परफॉर्म किया कि क्रू मेंबर्स की आंखों में आंसू आ गए. उन्होंने साबित कर दिया कि एक आर्टिस्ट के लिए इमेज मायने नहीं रखती, टैलेंट मायने रखता है.
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कहा तो ये भी जाता है कि जब फिल्म थिएटर में रिलीज हुई, तो एक अजीब सीन देखने को मिला. लोग फिल्म देखने गए थे अमिताभ बच्चन के लिए, लेकिन जब वे थिएटर से निकले तो उनकी जुबान पर अमजद खान (बिशन) का नाम था. अमजद खान ने बिशन के कैरेक्टर में एक ऐसी मासूमियत भर दी जो गब्बर सिंह के बिल्कुल उलट थी. जब बिशन अपनी गरीबी छिपाता है और अपने दोस्त की कामयाबी के लिए खुद को कुर्बान कर देता है, तो दर्शकों ने अमजद खान का हीरो के तौर पर स्वागत किया. कई क्रिटिक्स ने लिखा कि कुछ सीन में अमजद खान की इमोशनल एक्टिंग सुपरस्टार अमिताभ बच्चन से भी आगे निकल गई.

फिल्म की बात इसके गाने ‘सारा जमाना, हसीनों का दीवाना’ के बिना अधूरी है. अमिताभ बच्चन का लाइट वाला सफेद सूट आज भी सबका पसंदीदा माना जाता है. यह गाना कोलकाता के नेताजी इंडोर स्टेडियम में शूट किया गया था. कहा जाता है कि वहां इतनी भीड़ थी कि पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा. लोग अपने ‘जय और गब्बर’ को एक साथ देखने के लिए इतने बेताब थे कि कई बार शूटिंग रोकनी पड़ी. फिल्म में दिखाई गई स्टेडियम की भीड़ कोई एक्स्ट्रा नहीं बल्कि असली, बेकाबू भीड़ थी.

राजेश रोशन के म्यूजिक और किशोर कुमार की जादुई आवाज ने फिल्म की सफलता में चार चांद लगा दिए. ‘तेरे जैसा यार कहां…’ गाने ने अमजद खान और अमिताभ बच्चन को बॉलीवुड की सबसे बड़ी दोस्ती वाली जोड़ी बना दिया. ‘छूकर मेरे मन को…’ गाने ने गहरे प्यार और दोस्ती की भावनाओं को एक नया आयाम दिया. विकिपीडिया के आंकड़ों के अनुसार, ‘याराना’ 1981 की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में से एक बन गई थी.
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