दया किशन सप्रू हिंदी सिनेमा के उन कलाकारों में गिने जाते हैं, जिन्होंने अपने दमदार अभिनय और प्रभावशाली स्क्रीन प्रेजेंस से अलग पहचान बनाई. खास तौर पर फिल्म ‘साहिब बीबी और गुलाम’ में ‘मझले सरकार’ का उनका किरदार आज भी दर्शकों के दिलों में जिंदा है. दिलचस्प बात यह है कि फिल्मों में आने के लिए सप्रू बिना अपने माता-पिता को बताए ही पुणे पहुंच गए थे, जहां से उनके शानदार फिल्मी सफर की शुरुआत हुई.
कई बड़े स्टार्स संग रही दोस्ती
सप्रू की सबसे यादगार भूमिका साल 1962 की क्लासिक फिल्म ‘साहिब बीबी और गुलाम’ में ‘मझले सरकार’ के किरदार की रही. इस फिल्म में उनके संवाद बहुत ज्यादा नहीं थे, लेकिन उनकी खामोश और खतरनाक मौजूदगी ने दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ दी. आज भी इस किरदार को हिंदी सिनेमा के सबसे प्रभावशाली रोल्स में गिना जाता है.
जम्मू-कश्मीर में जन्मे थे एक्टर
सप्रू का जन्म 16 मार्च 1916 को जम्मू-कश्मीर में एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था. उनका पूरा नाम दया किशन सप्रू था. परिवार काफी बड़ा था, जिसमें चार भाई और दो बहनें थीं. उनके पिता डोगरा राज्य में खजांची थे और उस समय के शासक हरी सिंह के दौर में काम करते थे. परिवार के घर जम्मू और लाहौर दोनों जगह थे.
कभी ठेकेदारी का करते थे काम
उन्होंने अपनी पढ़ाई हिंदी और उर्दू माध्यम से की थी, लेकिन अंग्रेजी सीखने का उन्हें खास शौक था. इसी वजह से उन्होंने खुद ही अंग्रेजी सीख ली. बचपन से ही उन्हें संगीत में भी काफी दिलचस्पी थी. लाहौर में रहने के दौरान उन्होंने कुछ समय तक ठेकेदारी का काम भी किया और जालंधर कैंट में करीब दो-तीन साल रहे.फिल्मों में आने की उनकी कहानी भी काफी दिलचस्प है. कॉलेज के दोस्तों ने उनकी पर्सनालिटी और दमदार आवाज देखकर उन्हें फिल्मों में जाने की सलाह दी. दोस्तों की बात मानकर सप्रू बिना अपने माता-पिता को बताए पुणे पहुंच गए. वहां उनकी मुलाकात मशहूर फिल्मकार V. Shantaram और प्रभात स्टूडियो से जुड़े अन्य लोगों से हुई.
मीना कुमारी संग कर चुके काम
इसके बाद उन्हें साल 1944 में आई मराठी फिल्म राम शास्त्री में छोटा सा रोल मिला. बाद में उन्होंने हिंदी फिल्म चांद से डेब्यू किया. शुरुआती दौर में उन्होंने हीरो के रूप में भी काम किया और फिल्म लखा रानी में अभिनेत्री मोनिका देसाई के साथ नजर आए. उस समय उनकी सैलरी करीब ढाई से तीन हजार रुपये महीने हुआ करती थी. धीरे-धीरे उनकी पहचान एक मजबूत चरित्र अभिनेता के रूप में बनने लगी. फिल्मों में वह अक्सर जज, पुलिस कमिश्नर, जमींदार या खलनायक जैसे किरदार निभाते थे. की फिल्म ‘साहिब बीबी और गुलाम’ में निभाया गया उनका ‘मझले सरकार’ का किरदार उनके करियर का सबसे चर्चित रोल बन गया. कम ही लोग जानते हैं कि फिल्म पाकिजा में पहले उन्हें वह किरदार मिलने वाला था जो बाद में अशोक कुमार ने निभाया. हालांकि बाद में सप्रू को फिल्म में विलेन का रोल मिला. इसके अलावा उन्होंने ज्वैल थीफ, ‘ज्वेल थीफ’, ‘देवार’, ‘हीर रांझा’, ‘मुझे जीने दो’ जैसी फिल्मों में भी काम किया.
सप्रू की दोस्ती उस दौर के बड़े सितारों देव आनंद, गुरुदत्त और रहमान से थी, वह अपनी आवाज को मजबूत बनाए रखने के लिए रोज सुबह पांच बजे उठकर रियाज किया करते थे. बाद में उन्होंने होम्योपैथी की पढ़ाई भी की और डॉक्टर बन गए. 20 अक्टूबर 1979 को मुंबई में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया. इससे पहले उन्हें कैंसर भी हुआ था, लेकिन वह ठीक हो गए थे. बाद में तनाव की वजह से उनकी तबीयत बिगड़ गई. उनकी याद में साल 2024 में मुंबई के अंधेरी इलाके में फन रिपब्लिक रोड का नाम बदलकर ‘श्री दया किशन सप्रू मार्ग’ रखा गया.
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न्यूज 18 हिंदी में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे मुनीष कुमार का डिजिटल मीडिया में 9 सालों का अनुभव है. एंटरटेनमेंट रिपोर्टिंग, लेखन, फिल्म रिव्यू और इंटरव्यू में विशेषज्ञता है. मुनीष ने जामिया मिल्लिया इ…और पढ़ें
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